Sazaa Shayari - Dard, guilt aur insaaf ke ehsaas ko bayan karti lines

Sazaa shayari reflects the pain of punishment, guilt, and consequences of actions—whether in love, life, or relationships. It beautifully captures emotions like kasoor, regret, and justice through poetic expressions. These lines often resonate with those who feel punished by fate or their own decisions.

sazaa shayari
ख़ूब-सूरत ये मोहब्बत में सज़ा दी उस ने
फिर गले मिलके मेरी उम्र बढ़ा दी उस ने
Manzar Bhopali
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सज़ा कितनी बड़ी है गाँव से बाहर निकलने की
मैं मिट्टी गूँधता था अब डबलरोटी बनाता हूँ
Munawwar Rana
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आए कुछ अब्र कुछ शराब आए
इस के बा'द आए जो अज़ाब आए
Faiz Ahmad Faiz
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मुंसिफ़ हो अगर तुम तो कब इंसाफ़ करोगे
मुजरिम हैं अगर हम तो सज़ा क्यूँँ नहीं देते
Ahmad Faraz
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मेरी बाँहों में बहकने की सज़ा भी सुन ले
अब बहुत देर में आज़ाद करूँँगा तुझ को
Jaun Elia
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जुर्म में हम कमी करें भी तो क्यूँँ
तुम सज़ा भी तो कम नहीं करते
Jaun Elia
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मिरी सुब्ह का यूँँ भी इज़हार हो
पियाला हो कॉफ़ी का अख़बार हो

कोई जुर्म साबित न हो उस का फिर
जो तेरी हँसी में गिरफ़्तार हो
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Swapnil Tiwari
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तेरी आँखों के लिए इतनी सज़ा काफ़ी है
आज की रात मुझे ख़्वाब में रोता हुआ देख
Abhishek shukla
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आज पैवंद की ज़रूरत है
ये सज़ा है रफ़ू न करने की
Fahmi Badayuni
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यूँँ ज़िंदगी गुज़ार रहा हूँ तिरे बग़ैर
जैसे कोई गुनाह किए जा रहा हूँ मैं
Jigar Moradabadi
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ज़िंदगी से बड़ी सज़ा ही नहीं
और क्या जुर्म है पता ही नहीं
Krishna Bihari Noor
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कोई समझे तो एक बात कहूँ
इश्क़ तौफ़ीक़ है गुनाह नहीं
Firaq Gorakhpuri
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हमीं तक रह गया क़िस्सा हमारा
किसी ने ख़त नहीं खोला हमारा

मुआ'फ़ी और इतनी सी ख़ता पर
सज़ा से काम चल जाता हमारा
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Shariq Kaifi
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ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने
लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई
Muzaffar Razmi
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इस दौर-ए-मुंसिफ़ी में ज़रूरी नहीं 'वसीम'
जिस शख़्स की ख़ता हो उसी को सज़ा मिले
Waseem Barelvi
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ये मय-कदा है यहाँ हैं गुनाह जाम-ब-दस्त
वो मदरसा है वो मस्जिद वहाँ मिलेगा सवाब
Ali Sardar Jafri
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उम्र-भर के सज्दों से मिल नहीं सकी जन्नत
ख़ुल्द से निकलने को इक गुनाह काफ़ी है
Ambreen Haseeb Ambar
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इसी लिए हमें एहसास-ए-जुर्म है शायद
अभी हमारी मोहब्बत नई नई है ना
Afzal Khan
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या तो जो ना-फ़हम हैं वो बोलते हैं इन दिनों
या जिन्हें ख़ामोश रहने की सज़ा मालूम है
Shuja Khawar
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आरज़ू' जाम लो झिजक कैसी
पी लो और दहशत-ए-गुनाह गई
Arzoo Lakhnavi
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मुझ से क्या हो सका वफ़ा के सिवा
मुझ को मिलता भी क्या सज़ा के सिवा
Hafeez Jalandhari
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दिल में किसी के राह किए जा रहा हूँ मैं
कितना हसीं गुनाह किए जा रहा हूँ मैं
Jigar Moradabadi
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ख़ुद-कुशी जुर्म भी है सब्र की तौहीन भी है
इस लिए इश्क़ में मर मर के जिया जाता है
Ibrat Siddiqui
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हसीन लड़की से दिल लगाना भी इक ख़ता है मुझे पता है
अगर सज़ा में मिले क़ज़ा तो अलग मज़ा है मुझे पता है
Jatin shukla
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हैरान हो के देख रहे हैं मुझे अज़ाब
मैं मर रहा हूँ और बहुत इत्मीनान से
Vikram Gaur Vairagi
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हमारे कुछ गुनाहों की सज़ा भी साथ चलती है
हम अब तन्हा नहीं चलते दवा भी साथ चलती है
Munawwar Rana
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ये गूँगों की महफ़िल है निकलना ही पड़ेगा
क्या इतनी ख़ता कम है कि हम बोल पड़े हैं
Waseem Barelvi
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मिरे गुनाह की मुझ को सज़ा नहीं देता
मिरा ख़ुदा कहीं नाराज़ तो नहीं मुझ से
Shahid Zaki
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क्या जाने किस ख़ता की सज़ा दी गई हमें
रिश्ता हमारा दार पे लटका दिया गया

शादी में सब पसंद का लाया गया मगर
अपनी पसंद का उसे दूल्हा नहीं मिला
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Afzal Ali Afzal
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आधी आधी रात तक सड़कों के चक्कर काटिए
शा'इरी भी इक सज़ा है ज़िंदगी भर काटिए

कोई तो हो जिस से उस ज़ालिम की बातें कीजिए
चौदहवीं का चाँद हो तो रात छत पर काटिए
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Nisar Nasik
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जुर्म में शामिल रहेंगे खिड़कियाँ, दीवार, छत
और फिर औरत की अस्मत कुंडियाँ ले जाएंगी
Ravi 'VEER'
शौक़,लत,आवारगी,अय्याशी में गुज़री हमारी
ज़िन्दगी अब तू मुनासिब सी सज़ा दे गिनती कर के
Kartik tripathi
सज़ा सच बोलने की ये मिली है
सभी ने कर लिया हम से किनारा
Meem Alif Shaz
गर सज़ा में उम्र भर की बा-मशक़्क़त क़ैद है
जुर्म भी फिर इश्क़ सा संगीन होना चाहिए
Satyam Shukla
इश्क़ करना इक सज़ा है क्या करें
इश्क़ का अपना मज़ा है क्या करें
Syed Naved Imam
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ज़रा सी देर कोई मुझ
में रूनुमा हुआ था
फिर उस के बा'द नहीं जानता मैं क्या हुआ था

नए गुनाह की मुझे इस लिए इजाज़त है
मैं पिछले जुर्म में ताख़ीर से रिहा हुआ था
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Ejaz Tawakkal Khan
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मसाइल तो बहुत से हैं मगर बस एक ही हल है
सहरस शाम तक सर मेरा है बेगम की चप्पल है

मेरे मालिक भला इस सेे बुरी भी क्या सज़ा होगी
मेरा शादीशुदा होना ही दोज़ख़ की रिहर्सल है
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Paplu Lucknawi
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जन्नत में आ गया था किसी अप्सरा पे दिल
जिस की सज़ा-ए-मौत में दुनिया मिली मुझे
Ankit Maurya
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बिछड़ते वक़्त भी हिम्मत नहीं जुटा पाया
कभी भी उस को गले से नहीं लगा पाया

किसी को चाहते रहने की सज़ा पाई है
मैं चार साल में लड़की नहीं पटा पाया
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Shadab Asghar
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ये तो कहिए इस ख़ता की क्या सज़ा
मैं जो कह दूँ आप पर मरता हूँ मैं
Dagh Dehlvi
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वो मेरा जब न हो सका तो फिर यही सज़ा रहे
किसी को प्यार जब करूँँ वो छुप के देखता रहे
Mazhar Imam
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तोड़ कर तुझ को भला मेरा भी क्या बन जाता
उल्टा मैं ख़ुद की मुहब्बत प सज़ा बन जाता

जितनी कोशिश है तिरी एक तवज्जोह के लिए
उस सेे कम में तो मैं दुनिया का ख़ुदा बन जाता
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Ashutosh Vdyarthi
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मिन्नतें करता था रुक जाओ मेरा कोई नहीं
मेरे रोके से मगर कौन रुका कोई नहीं

बेवफ़ाई को बड़ा जुर्म बताने वाले
याद है तू ने भी चल छोड़ हटा कोई नहीं
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Khan Janbaz
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हम ने क़ुबूल कर लिया अपना हर एक जुर्म
अब आप भी तो अपनी अना छोड़ दीजिए
Harsh saxena
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फ़रेब दे गया इस सादगी से वो मुझ को
कि जुर्म सारा ही मजबूरियों के सर आया
Harsh saxena
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हम एक रात हुए थे क़रीब और क़रीब
फिर उस के बा'द का क़िस्सा गुनाह जैसा है
Aks samastipuri
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अंजाम-ए-वफ़ा ये है जिस ने भी मोहब्बत की
मरने की दुआ माँगी जीने की सज़ा पाई
Nushur Wahidi
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क़सम ख़ुदा की बड़े तजरबे से कहता हूँ
गुनाह करने में लज़्ज़त तो है सुकून नहीं
Mehshar Afridi
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याद-ए-माज़ी 'अज़ाब है या-रब
छीन ले मुझ से हाफ़िज़ा मेरा
Akhtar Ansari
मोहब्बत की सज़ा तर्क-ए-मोहब्बत
मोहब्बत का यही इन'आम भी है
Wamiq Jaunpuri
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जुर्म की तरह मोहब्बत को छुपा रक्खा है
हम गुनहगार नहीं हैं ये बताएँ किस को

रूठ जाते तो मनाना कोई दुश्वार न था
वो तअ'ल्लुक़ ही न रक्खें तो मनाएँ किस को
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Akhtar Saeed Khan
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ग़लती मिरी है मुझ को तिरा ऐतिबार था
मेरी यही सज़ा है मुझे शर्मसार कर
Amaan Pathan
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इश्क़ में वो भी एक वक़्त है जब
बे-गुनाही गुनाह है प्यारे
Anand Narayan Mulla
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ये किस अज़ाब में छोड़ा है तू ने इस दिल को
सुकून याद में तेरी न भूलने में क़रार
Shohrat Bukhari
अपना पता मिले न ख़बर यार की मिले
दुश्मन को भी न ऐसी सज़ा प्यार की मिले

उन को ख़ुदा मिले, है ख़ुदा की जिन्हें तलाश
मुझ को बस इक झलक मेरे दिलदार की मिले
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Kaifi Azmi
मुझ को मिरी शिकस्त की दोहरी सज़ा मिली
तुझ से बिछड़ के ज़िंदगी दुनिया से जा मिली
Saqi Faruqi
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कौन सा जुर्म ख़ुदा जाने हुआ है साबित
मशवरे करता है मुंसिफ़ जो गुनहगार के साथ
Saleem Siddiqui
नज़र-अंदाज़ करने की सज़ा देनी थी तुझ को
तेरे दिल में उतर जाना ज़रूरी हो गया था
Waseem Barelvi
एक मैं ने ही उगाए नहीं ख़्वाबों के गुलाब
तू भी इस जुर्म में शामिल है मेरा साथ न छोड़
Mazhar Imam
दोस्तों से मुलाक़ात की शाम है
ये सज़ा काट कर अपने घर जाऊँगा
Mazhar Imam
यूँ मेरे ख़्वाबों को हसीं बना कर तुम क्या पाओगे
मुझ सेे नजदीकियां बढ़ाने की तुम सज़ा पाओगे

मैं बदनाम हूँ किसी से मोहब्बत की ख़ातिर "निहार"
मुझ सेे इश्क़ कर के तुम फ़क़त दर्द-ए-वफ़ा पाओगे
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Shashank Tripathi
नींद ज़रूरी है कोई ख़्वाब देखने के लिए
वो छत पे आई है महताब देखने के लिए

कोई समझाये उसे की वो कोई हक़ीम नहीं
वो ज़िद कर रही है मेरा अज़ाब देखने के लिए
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MANOBAL GIRI
तुम्हें हक है की सज़ा-ए-मौत दो हमें
हमारा हक है की पहले गुनाह साबित हो
Praveen Bhardwaj
सब एक खता पर मुझ को कहने लगे क्या क्या
मैं ने तो ये समझा था सब मुझ को समझते हैं
Prashant Sitapuri
हम इस अज़ाब से क्यूँ ना ख़ौफ़ खाए मुर्शिद
मर जाए जब क़रीबी अपना यहाँ यकायक
Zain Aalamgir
इक हसीं सा गुनाह करते हैं
साथ आओ निबाह करते हैं

अस्ल में तो है ही नहीं मुमकिन
ख़्वाब में ही, विवाह करते हैं
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Sandeep Gandhi Nehal
दर्द आँखों में आया उतर कर
इस तरह मैं ने ख़ुद को सज़ा दी
Lokesh Singh
मुंसिफ़ सुनो तुम, उम्र-भर की ये सज़ा कम ही लगे
इंसान को मिल मुफ़लिसी, है ये सज़ा-ए-मौत ही
Zain Aalamgir
तुझे चाहने की सज़ा मैं ने ख़ुद को दी है
मेरी ज़िंदगी तबाह, मैं ने ख़ुद ही की है
Swarup M
देखो न एक जुर्म की इतनी सज़ा मिली
उस ने जुदा भी कर दिया और साथ भी रखा
Shivam chaubey
ऐसी लुत्फ़-ए-सज़ा न फिर हो नसीब
क़ैद-ए-आग़ोश से रिहा मत कर
Dharmesh Solanki
गुनहगार तो पहुंच से बहुत दूर थे
सज़ा उन्हें मिली जो बेकुसूर थे
Anurag Ravi
जो वफ़ा करते हैं उन को तो सज़ा मिलती है
बेवफाओं को ही ईनाम-ए-वफ़ा मिलती है
Aditya
ज़िंदगी जिए जाने में 'अज़ाब हैं कितने
और मौत आने का यार ख़ौफ़ है कितना
Kohar
ख़ुशनसीबी है तुम सेे इश्क़ हुआ
और ये ही मेरी सज़ा साहब
Ashutosh Kumar "Baagi"
दिल को इतनी बड़ी सज़ा दूँगा
देख लेना तुझे भुला दूँगा
Saarthi Baidyanath
उठ के जिया अज़ाब जब यूँँ सीने पे मैं ने देखा
मेरा दिया गुलाब जब उस ने मेरे मुँह पे मारा
Yogamber Agri
साथ उस का छोड़ता हूँ, हाथ ऐसे काँपते है
जुर्म करने पर कोई मुजरिम के जैसे काँपते है
karan singh rajput
ये हक़ीक़त और ये उम्मीद, यकसाँ क्यूँ नहीं है
मुफ़लिसी जब हो मुक़द्दर, चल रही साँसे सज़ा हो
Zain Aalamgir
शे'र सी ग़ज़ल सी मेरे क़रीब तुम ही थी
जुर्म लगता है औरों के क़रीब जाना अब
Yogamber Agri
कोई तो मुझ को बता दे ये हिज्र का मारा
अज़ाब-ए-गफ़लत-ए-क़ातिल बयान कैसे करूँँ
Shajar Abbas
ज़हर मैं बे-वफ़ाई का कभी भी पी नहीं सकता
कलेजा फट गया ज़ख़्मों से उस को सी नहीं सकता

ख़ुदा क्यूँ फ़ैसला ऐसा मेरे ही साथ करना था?
सज़ा-ए-मौत दे दो पर जुदाई जी नहीं सकता
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Aniket sagar
तुम्हारे ख़्वाब में आना नहीं है
मगर हाँ दूर भी जाना नहीं है

ख़ता ये है कि तुम को चाहता हूँ
सज़ा ये है तुम्हें पाना नहीं है
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Jatin shukla
ख़ुद-कर्दा गुनाहों की सज़ा ढूंढ रहे हैं
अब चार सू हम ख़ौफ़े-ख़ुदा ढूंढ रहे हैं
A R Sahil "Aleeg"
आँखों में देखने की मुझे ये सज़ा मिली
नफ़रत से देखता है मेरा आइना मुझे
Abuzar kamaal
दुखाए बहुतों के दिलों को मैं ने, मानता हूँ
मुआ'फ़ी नहीं अब, सज़ा जानलेवा रब दे मुझ को
A R Sahil "Aleeg"
किसी ने था पूछा कि क्या है मोहब्बत
मैं ने कह दिया था मोहब्बत सज़ा है
Prashant Sitapuri
गुनाह-ए-इश्क़ ने सिखला दिया है ये हुनर भी देख
जनाज़ा भी मेरा ही और कांधा भी है ख़ुद का ही
A R Sahil "Aleeg"
हम करेंगे गुनाह दोबारा
लुत्फ़ आया अगर नदामत में
Vijay Anand Mahir
इश्क़ और भूक, क्या बताएँ
हर गुनाह का सबब यही दो
A R Sahil "Aleeg"
न कोई शिकवा शिकायत, न रोना-धोना, न कोशिश करूँँगा मैं रोकने की
फ़क़त इतना कह दो, इस बेवफ़ाई की क्या वजह है? ख़ता आख़िर क्या है मेरी
A R Sahil "Aleeg"
मैं तेरे हिज्र में ख़ुद को ये सज़ा दूँगा सनम
अपनी हस्ती को ज़माने से मिटा दूँगा सनम
Shajar Abbas
अल्लाह करे के मुझ को पनाह-ए-क़ज़ा मिले
फिर उस के बा'द तुम को सज़ा ज़िन्दगी की हो
Upendra Bajpai
रौंद कर जो कुछ गया हूँ साथ नक्श-ए-पा में है
जुड़ गया है दर्द मुस्तक़बिल में मेरे जुर्म का
Arihant jain
सब गुनाहों की सज़ा गर मौत कर दी जाए तो
इस जहाँ में पेड़ पौधे पत्तियाँ रह जाएंगी
Ravi 'VEER'
मैं क़ैद था क़फ़स में और वो उड़ रहा था सामने
ये पहली बार था के पंख अहमियत में थे नहीं

मुआ'फ़ कर दिया है हम ने सोच कर के कुछ मगर
तिरे गुनाह तो ऐ यार माज़रत में थे नहीं
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Divyansh "Dard" Akbarabadi
अपने दामन को गुनाह से मैं बचा लूँगा
फिर ख़ुदा को रो-रो के इक दिन मना लूँगा
Sayeed Khan
शा'इरी में पनाह लेता हूँ
अपने सर ये गुनाह लेता हूँ
Saarthi Baidyanath
हर गुनह को इक सज़ा है उस का हक़ दोस्त
बे-वफ़ा मरता नहीं, कितना ग़लत है
BR SUDHAKAR
तन्हा रहना और ख़ुश रहना, सज़ा काफ़ी नहीं
तय हुआ वक़तन-फ़वक़तन सामने भी आना है
pankaj pundir
बेवफ़ाई की तुम ने जाँ, और सज़ा ख़ुद को देता हूँ
चाय, सिगरेट और गाँजा से जलाता हूँ इस दिल को
A R Sahil "Aleeg"
हिज्र मुझ पर अज़ाब ले आया
जबसे मालूम खु़श नहीं वो भी
Sayeed Khan
अब कभी पूछ ले यार, मेरा गुनाह क्या
इस क़दर उल्फ़तों का सज़ा दे गया मुझे
Raunak Karn
मुसलमाँ अब हुए हैं सब हजारों साल काफ़िर थे
मिली दुनिया सज़ा में ही सफ़र के हम मुसाफ़िर थे
Afzal Sultanpuri
कोई उम्मीद मत सज़ा गुलशन
तिरी ख़ुश्बू का वास्ता है तुझे
Gulshan
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दिल को इतनी बड़ी सज़ा दूँगा
उस की तस्वीर भी जला दूँगा
Gulshan
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न हो अब मुहब्बत यही इल्तिजा है
मुहब्बत मुहब्बत नहीं इक सज़ा है
Mohammad Talib Ansari
ज़िंदगी को अज़ाब कर लेना
मौत से भी ख़राब कर लेना
Afzal Sultanpuri