Gunaah Shayari - Words of guilt, sin, regret, and hidden emotions

Gunaah shayari reflects the deep emotions of guilt, regret, and hidden sins that weigh on the heart. It captures the feeling of being a gunahgaar, the pain of mistakes, and the silent burden of past actions. These verses often explore inner conflict, confession, and the consequences of choices made in love and life.

इक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन
देखे हैं हम ने हौसले परवरदिगार के
Faiz Ahmad Faiz
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यूँँ ज़िंदगी गुज़ार रहा हूँ तिरे बग़ैर
जैसे कोई गुनाह किए जा रहा हूँ मैं
Jigar Moradabadi
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कोई समझे तो एक बात कहूँ
इश्क़ तौफ़ीक़ है गुनाह नहीं
Firaq Gorakhpuri
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होंटों पे कभी उन के मिरा नाम ही आए
आए तो सही बर-सर-ए-इल्ज़ाम ही आए
Ada Jafarey
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वैसे तो तुम्हीं ने मुझे बर्बाद किया है
इल्ज़ाम किसी और के सर जाए तो अच्छा
Sahir Ludhianvi
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इस दौर-ए-मुंसिफ़ी में ज़रूरी नहीं 'वसीम'
जिस शख़्स की ख़ता हो उसी को सज़ा मिले
Waseem Barelvi
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ये मय-कदा है यहाँ हैं गुनाह जाम-ब-दस्त
वो मदरसा है वो मस्जिद वहाँ मिलेगा सवाब
Ali Sardar Jafri
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उम्र-भर के सज्दों से मिल नहीं सकी जन्नत
ख़ुल्द से निकलने को इक गुनाह काफ़ी है
Ambreen Haseeb Ambar
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दिल पे आए हुए इल्ज़ाम से पहचानते हैं
लोग अब मुझ को तिरे नाम से पहचानते हैं
Qateel Shifai
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आरज़ू' जाम लो झिजक कैसी
पी लो और दहशत-ए-गुनाह गई
Arzoo Lakhnavi
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मल्लाहों को इल्ज़ाम न दो तुम साहिल वाले क्या जानो
ये तूफ़ाँ कौन उठाता है ये कश्ती कौन डुबोता है
Hafeez Jalandhari
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झिझकता हूँ उसे इल्ज़ाम देते
कोई उम्मीद अब भी रोकती है
Shariq Kaifi
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दिल में किसी के राह किए जा रहा हूँ मैं
कितना हसीं गुनाह किए जा रहा हूँ मैं
Jigar Moradabadi
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उस के दिल की आग ठंडी पड़ गई
मुझ को शोहरत मिल गई इल्ज़ाम से
Siraj Faisal Khan
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हसीन लड़की से दिल लगाना भी इक ख़ता है मुझे पता है
अगर सज़ा में मिले क़ज़ा तो अलग मज़ा है मुझे पता है
Jatin shukla
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बस एक लम्हे के सच झूट के एवज़ 'फ़रहत'
तमाम उम्र का इल्ज़ाम ले गया मुझ से
Farhat Abbas Shah
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इतना संगीन पाप कौन करे
मेरे दुख पर विलाप कौन करे

चेतना मर चुकी है लोगों की
पाप पर पश्चाताप कौन करे
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Azhar Iqbal
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ये गूँगों की महफ़िल है निकलना ही पड़ेगा
क्या इतनी ख़ता कम है कि हम बोल पड़े हैं
Waseem Barelvi
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मिरे गुनाह की मुझ को सज़ा नहीं देता
मिरा ख़ुदा कहीं नाराज़ तो नहीं मुझ से
Shahid Zaki
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क्या जाने किस ख़ता की सज़ा दी गई हमें
रिश्ता हमारा दार पे लटका दिया गया

शादी में सब पसंद का लाया गया मगर
अपनी पसंद का उसे दूल्हा नहीं मिला
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Afzal Ali Afzal
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एक बोसे के तलबगार हैं हम
और माँगे तो गुनहगार हैं हम
Unknown
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यूँँ तो वो शख़्स बिल्कुल बे-गुनह है
ज़माने की मगर उस पे निगह है

हमारे दरमियाँ जो दूरियाँ हैं
यक़ीनन तीसरी कोई वजह है
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Dileep Kumar
देख कर हर कोई बेकार समझ ले मुझ को
अपनी उल्फ़त में गिरफ़्तार समझ ले मुझ को

बिना उस के तिरी जन्नत मुझे मंज़ूर नहीं
तू मिरी मान गुनहगार समझ ले मुझ को
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Faiz Ahmad
बेशक तू बे-वफ़ा का सनम नाम दे मुझे
बा'द आज़माने के मगर इल्ज़ाम दे मुझे
Ajeetendra Aazi Tamaam
नहीं थकते मुझे इल्ज़ाम देते
भला कब तक ये बेरहमी करोगे

अगर सच बोलने मैं लग गया तो
ग़लत फ़हमी ग़लत फ़हमी करोगे
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Gopesh "Tanha"
ज़रा सी देर कोई मुझ
में रूनुमा हुआ था
फिर उस के बा'द नहीं जानता मैं क्या हुआ था

नए गुनाह की मुझे इस लिए इजाज़त है
मैं पिछले जुर्म में ताख़ीर से रिहा हुआ था
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Ejaz Tawakkal Khan
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जन्नत में आ गया था किसी अप्सरा पे दिल
जिस की सज़ा-ए-मौत में दुनिया मिली मुझे
Ankit Maurya
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हाँ आप को देखा था मोहब्बत से हमीं ने
जी सारे ज़माने के गुनहगार हमीं थे
Ehsan Danish
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जो अंजान थे वो मेरे यार निकले
मगर जो भी अपने थे बेकार निकले

ज़मीं खा गई उन वफ़ाओं को आख़िर
सितम ये हुआ हम गुनहगार निकले
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Hameed Sarwar Bahraichi
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एक हमें आवारा कहना कोई बड़ा इल्ज़ाम नहीं
दुनिया वाले दिल वालों को और बहुत कुछ कहते हैं
Habib Jalib
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तोड़ कर तुझ को भला मेरा भी क्या बन जाता
उल्टा मैं ख़ुद की मुहब्बत प सज़ा बन जाता

जितनी कोशिश है तिरी एक तवज्जोह के लिए
उस सेे कम में तो मैं दुनिया का ख़ुदा बन जाता
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Ashutosh Vdyarthi
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हम एक रात हुए थे क़रीब और क़रीब
फिर उस के बा'द का क़िस्सा गुनाह जैसा है
Aks samastipuri
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क़सम ख़ुदा की बड़े तजरबे से कहता हूँ
गुनाह करने में लज़्ज़त तो है सुकून नहीं
Mehshar Afridi
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जुर्म की तरह मोहब्बत को छुपा रक्खा है
हम गुनहगार नहीं हैं ये बताएँ किस को

रूठ जाते तो मनाना कोई दुश्वार न था
वो तअ'ल्लुक़ ही न रक्खें तो मनाएँ किस को
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Akhtar Saeed Khan
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मत पूछ कि हम ज़ब्त की किस राह से गुज़रे
ये देख कि तुझ पर कोई इल्ज़ाम न आया
Mustafa Zaidi
इश्क़ में वो भी एक वक़्त है जब
बे-गुनाही गुनाह है प्यारे
Anand Narayan Mulla
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कौन सा जुर्म ख़ुदा जाने हुआ है साबित
मशवरे करता है मुंसिफ़ जो गुनहगार के साथ
Saleem Siddiqui
अस्ल क़ातिल तो सामने है मगर
तुम को इल्ज़ाम मुझ पे धरना है
Amaan Pathan
ख़ुदा के अब्द को तो है मुआ'फ़ी की ताईद
हम ऐसे दहरिया जाए कहाँ गुनह ले कर
Haresh Vanza
आईने के दोनों तरफ़ मुजरिम खड़ा है और
लोग हैं कि आईने को गुनहगार बताते हैं
Murli Dhakad
ग़मों में जी रहे है रिंद सारे
खता मत पूछ याँ सागर गिरा है
Nilesh Barai
इक रोज़ हमारे बिखरते रिश्ते का राज़ खोल दिया उस ने
इल्ज़ाम मुझ पे डाल कर, जुदा होने को बोल दिया उस ने

उस सेे मोहब्बत इतनी कि ख़ामोशी से सुनता रहा तोहमतें
बड़ी बेरुखी से "निहार" मेरी मोहब्बत को तोल दिया उस ने
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Shashank Tripathi
गुनाह कर के गुनहगार की मैं शफ में तो खड़ा हूँ
अब इस सेे ज़्यादा आँख का पानी क्या दिखाऊँ
Aryan Goswami
एक ख़त्म नहीं होता कि रग-ए-जां दबाने को
कोई नया मसअला तैयार रहता है

जाने तू कैसी अदालत का मुंसिफ़ है
तेरी निगाह में हर शख़्स गुनहगार रहता है
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Sushrut Tiwari
"तितली" की तो आदत होती है फूल बदलना
गुनहगार तो गुलाब है जो याद मैं मुरझा गया
Piyush
एक खिड़की है, एक गली है, एक पता है
सौ बार गुजर के भी भुल जाना मेरी खता है
Animesh Choubey
तुम्हें हक है की सज़ा-ए-मौत दो हमें
हमारा हक है की पहले गुनाह साबित हो
Praveen Bhardwaj
सब एक खता पर मुझ को कहने लगे क्या क्या
मैं ने तो ये समझा था सब मुझ को समझते हैं
Prashant Sitapuri
इक हसीं सा गुनाह करते हैं
साथ आओ निबाह करते हैं

अस्ल में तो है ही नहीं मुमकिन
ख़्वाब में ही, विवाह करते हैं
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Sandeep Gandhi Nehal
गुनहगार तो पहुंच से बहुत दूर थे
सज़ा उन्हें मिली जो बेकुसूर थे
Anurag Ravi
हर शे'र हर ग़ज़ल पे है ऐसी छाप तेरी
तस्वीर बन रही है इक अपने आप तेरी

तेरे लिए किसी को इतना दीवाना देखा
लगने लगी है मुझ को चाहत भी पाप तेरी
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Sandeep Thakur
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ज़ीस्त की खोखली हैहात पे रह जाते हैं
वो जो कमज़र्फ़ हैं, औक़ात पे रह जाते हैं

ओढ़ लेती है शराफ़त की रिदा रोज़ सहर
और इल्ज़ाम फ़क़त रात पे रह जाते हैं
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KARAN
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कैसे कह दूँ के तिरी ख़ुश्कियों से हारा हूँ
देख अब तक तिरी आँखों को मैं गवारा हूँ

लाख इल्ज़ाम मिरे सर पे ज़माने के मगर
मिरी नज़रों से मुझे देख कितना प्यारा हूँ
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Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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मोहब्बत का बनाया संग था इक धाम पन्नों पर
हमें घाइल भी करने का था हर इल्जाम पन्नों पर

वो कॉपी बिक गईं रद्दी के भावों में सभी जिन के
बनाया दिल लिखा तुम ने था मेरा नाम पन्नों पर
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Naimish trivedi
जी में आता है अब इस रिश्ते को कुछ नाम न दूँ
मर भी जाऊँ तो तुझ को मौत का पैग़ाम न दूँ

मुझ को जन्नत से निकलवाने में है हाथ तेरा
और तू फिरती है कहे तुझ को मैं इल्ज़ाम न दूँ
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A R Sahil "Aleeg"
ज़हर मैं बे-वफ़ाई का कभी भी पी नहीं सकता
कलेजा फट गया ज़ख़्मों से उस को सी नहीं सकता

ख़ुदा क्यूँ फ़ैसला ऐसा मेरे ही साथ करना था?
सज़ा-ए-मौत दे दो पर जुदाई जी नहीं सकता
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Aniket sagar
तुम्हारे ख़्वाब में आना नहीं है
मगर हाँ दूर भी जाना नहीं है

ख़ता ये है कि तुम को चाहता हूँ
सज़ा ये है तुम्हें पाना नहीं है
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Jatin shukla
फिर से इस इश्क़ की ख़ता अब कौन करे
भर चुके ज़ख़्म जो, हरा अब कौन करे
A R Sahil "Aleeg"
गुनाह-ए-इश्क़ ने सिखला दिया है ये हुनर भी देख
जनाज़ा भी मेरा ही और कांधा भी है ख़ुद का ही
A R Sahil "Aleeg"
है विचारों से पाप का भागी
मात्र धारण है वस्त्र साधू का
Tarique Jamal
हम करेंगे गुनाह दोबारा
लुत्फ़ आया अगर नदामत में
Vijay Anand Mahir
इश्क़ और भूक, क्या बताएँ
हर गुनाह का सबब यही दो
A R Sahil "Aleeg"
न कोई शिकवा शिकायत, न रोना-धोना, न कोशिश करूँँगा मैं रोकने की
फ़क़त इतना कह दो, इस बेवफ़ाई की क्या वजह है? ख़ता आख़िर क्या है मेरी
A R Sahil "Aleeg"
तुम्हारे इल्ज़ाम का क्या बुरा मानूँ
बहन छोटी और फिर लाडली भी हो
A R Sahil "Aleeg"
जहाँ के इल्ज़ाम का क्या बुरा मानूँ
लगाए इल्ज़ाम अपनों ने भी मुझ पर
A R Sahil "Aleeg"
अपने शहर से भागता फिर रहा हूँ
मुझ पे मेरे क़त्ल का इल्ज़ाम है
Faisal Yaseen
मैं क़ैद था क़फ़स में और वो उड़ रहा था सामने
ये पहली बार था के पंख अहमियत में थे नहीं

मुआ'फ़ कर दिया है हम ने सोच कर के कुछ मगर
तिरे गुनाह तो ऐ यार माज़रत में थे नहीं
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Divyansh "Dard" Akbarabadi
अपने दामन को गुनाह से मैं बचा लूँगा
फिर ख़ुदा को रो-रो के इक दिन मना लूँगा
Sayeed Khan
शा'इरी में पनाह लेता हूँ
अपने सर ये गुनाह लेता हूँ
Saarthi Baidyanath
हर गुनह को इक सज़ा है उस का हक़ दोस्त
बे-वफ़ा मरता नहीं, कितना ग़लत है
BR SUDHAKAR
कभी ग़फ़लत में या वहशत में, दिल तोड़ा हो किसी का
ख़ता मुझ सेे ये, हुआ ही नहीं है सरज़द अभी तक
A R Sahil "Aleeg"
करेंगे हर पल वफ़ा तुम से इंशा-अल्लाह जाँनाँ
जफ़ा कर बैठूँ तो इल्ज़ाम रब की मर्ज़ी पे होगा
A R Sahil "Aleeg"
किए थे पाप जितने भी बुरे सदक़ा उतारा था
हज़ारों मुश्किलों की जद में रिश्ता हमारा था

गिरे थे भाव सोंनें और चाँदी के मिनट भर में
उसनें जब भरी बाज़ार में झुमका उतारा था
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Subrat Tripathi
हो ख़ताकार तुम मोहब्बत की
अब सज़ा-ए-फ़िराक़ वाजिब है
Shajar Abbas
कर्ण बनकर दोस्ती में कर रहे हैं पाप लेकिन
हम युधिष्ठिर तो नहीं जो द्रौपदी पर दाँव खेलें
Gaurav Singh
दुख लेने को उस का तो मैं भी ले सकता था
उस के इल्जाम को मैं अपने सर ले सकता था

चाहे पास से उस को देख नहीं था सकता मैं
लेकिन दूर से उस की तस्वीर तो ले सकता था
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Pankaj kargeti
अब कभी पूछ ले यार, मेरा गुनाह क्या
इस क़दर उल्फ़तों का सज़ा दे गया मुझे
Raunak Karn
इस जानिब से देखोगे तो पाक नज़र आएगा
उस जानिब से देखोगे तो पाप नज़र आएगा
Afzal Sultanpuri
हमेशा शे'र के ही हाथ में होता है सब जंगल
ये सत्ता भी हमेशा कातिलों के हाथ होती है

छुड़ाया हाथ पत्ते ने मगर इल्जाम पेड़ों पर
ये दुनिया भी हमेशा जुल्मियों के साथ होती है
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Shoonya Shrey
पाप करने का नहीं अब डर रहा
घाट पे गंगा के सब धुल जाएँगे
Umesh Maurya
नहीं सोचा जहाँ इल्ज़ाम अब हम पर लगाने में
लगे थे हम हक़ीक़त यार अब सब को बताने में

ख़ुशी दी थी सभी को खेल भी खेले बहुत सारे
मगर सबने कसर कोई न छोड़ी है सताने में
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Raunak Karn
गर इश्क़ नहीं होता बदनाम नहीं होता
तुझ पे मिरी जांँ कोई इल्ज़ाम नहीं होता
shaan manral
मुझे वो प्यार कर लेती तो उस को पाप लग जाता
हजारों साल की वो मान्यताएँ टूट जाती तो
Umesh Maurya
वो जो इल्ज़ाम हम पर ही लगा के फिर ख़फ़ा हैं अब
हमें कह बद-चलन ख़ुद ही हुए वो बे-वफ़ा हैं अब
Shivam Mishra
जो कहा था वो किया तो क्या खता मुझ सेे हुई है
बे-वफ़ा से की वफ़ा फिर वो खफ़ा मुझ सेे हुई है

जिस नज़र से ज़िंदगी को देख मरता मर चुका है
उस नज़र से की मोहब्बत क्या जफ़ा मुझ सेे हुई है
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Chetan
मौत से बच न पाएँगे हरगिज़
बच सकें तो गुनाह से बचिए
Shakir Dehlvi
गर बिछड़ना है बिछड़ जाओ सनम
पर न हम को इस तरह इल्ज़ाम दो
Ajeetendra Aazi Tamaam
तक़दीर मेरी मुझ सेे बग़ावत यूँँ कर गई
जैसे गुलों पे ख़ुशबू ही इल्ज़ाम धर गई
Navneet krishna
जुर्म किस का किस के सर इल्ज़ाम आया
आज रोया जाके तब आराम आया

हो रही थी जंग उस के नाम पर और
वो ही मेरे दुश्मनों के काम आया
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Shashank Shekhar Pathak
तक़दीर मेरी मुझ सेे बग़ावत यूँँ कर गई
जैसे गुलों पे ख़ुशबू ही इल्ज़ाम धर गई
Navneet krishna
एक ख़ता तुम ने की एक ख़ता मैं ने की
फिर ये झगड़ा कैसा हाथ मिलाओ साहिब
Meem Alif Shaz
लगाता फिर रहा है मुझ पे जो इल्ज़ाम तो ये सुन
यहीं आ कर मिटाएगा मेरे इल्ज़ाम तू सारे
Piyush Mishra 'Aab'
जिन आँखों में छोटे मोटे सपने हैं
उन आँखों में आलस आना पाप समझ
Sanskar Shrivastav
ये ख़ता है तो क्यूँ ये ख़ता है
जिस
में जाँ हम ही तुम पे फ़िदा हैं
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Danish Balliavi
गुनाह इश्क़' अगर है, तो फिर गुनाह करो
और इस गुनाह को दुनिया में बेपनाह करो

नहीं है बात ये में'यार को मेरे, मंज़ूर
मैं तुम को शे'र सुना कर कहूँ कि, वाह करो
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Musarif Husain Mansoori
नाज़ हर वक़्त तेरे कौन उठाएगा बता
अब मेरे बा'द तुझे कौन मनाएगा बता

अपने क़दमों को तो मैं गिन के रखूँ राहों में
चल के तू साथ कहाँ तक मेरे आएगा बता

इक मुझे छोड़ के हर सम्त नज़र तेरी गई
और कितना तू निगाहों से गिराएगा बता

मुझ पे इल्ज़ाम लगाने से ये पहले सुन ले
क्या करेगा जो तेरा नाम भी आएगा बता

आतिश-ए-इश्क़ में हम शौक़ से जल जाएँगे
खाक़ मेरी तू हवाओं में उड़ाएगा बता

हम ज़माने से भी लड़ जाएँ जो तेरी ख़ातिर
फ़र्द तू फ़र्ज़ मुहब्बत का निभाएगा बता
Read Full
Rajesh fard unnavi
हम को भी ख़ता करने का इन'आम मिला है
इक झूठ से बचने का भी इल्ज़ाम मिला है
Meem Alif Shaz
लगाता अब वही इल्ज़ाम हम पर
लुटाता था कभी जो शाम हम पर
Murari Mandal
राम जैसा पुरुष फिर हुआ ही नहीं
पाप धरती से कम हो सका ही नहीं

व्यर्थ पुतले जलाने से क्या फ़ाइदा
जब वो अंदर का रावण मरा ही नहीं
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Daqiiq Jabaalii
तपिश बड़ा के गुनाह न कर
यूँँ ज़िंदगी को तबाह न कर

ये ज़ख़्म ही तो दवाइयाँ हैं
जो जाँ भी ले लें तो आह न कर
Read Full
Ajeetendra Aazi Tamaam
चाहते हो उसे पता न लगे
दूसरा इश्क़ दूसरा न लगे

बेवफ़ाई गुनाह है और तुम
सोचते हो कि बद-दु'आ न लगे
Read Full
Kumar gyaneshwar
बेबसी भी गुनाह है साहब
हाल अपना तबाह है साहब
Sabir Pathan
हो गया बे-गुनाह मैं साबित
फिर भी हाकिम का दिल नहीं पिघला
Sohil Barelvi
किसी का 'ऐब मत खोलो तुम अपने आप को देखो
बुरा पापी नहीं होता तुम उस के पाप को देखो

अगर बनना है तुम को एक बेहतर आदमी तो फिर
कलाकारों को मत देखो तुम अपने बाप को देखो
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ZafarAli Memon
शहर में गुनाह घर बनाता ही नहीं अगर
काटने लगे सज़ा बशर जो संविधान से
100rav
जंग आलूदा था हर इल्ज़ाम तेरा
तू मुझे कैसे हराता मेरे भाई
Meem Alif Shaz
ये नागिन सी तेरी ज़ुल्फ़ें घटा बनकर जो छाएंगी
तड़प कर मर भी जाऊँ तो नहीं इल्ज़ाम लिक्खूँगा
Mamta 'Anchahi'
जिस तरफ़ उस की निगाहें मुड़ गई
इक दफ़ा जैसे सज़ा-ए-मौत हो
Umesh Maurya