Beautiful Kashmir Shayari - Poetry inspired by valleys, beauty, and soulful silence

Kashmir Shayari captures the breathtaking beauty, शांत sukoon, and emotional depth of the valley. From snow-covered peaks to serene lakes, these lines reflect nature, love, and silence in poetic form. Perfect for expressing admiration, peace, and soulful thoughts inspired by Kashmir’s charm.

kashmir shayari
तुम्हारे पाँव क़सम से बहुत ही प्यारे हैं
ख़ुदा करे मेरे बच्चों की इन में जन्नत हो
Rafi Raza
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waadi shayari
साहिल के सुकूँ से किसे इनकार है लेकिन
तूफ़ान से लड़ने में मज़ा और ही कुछ है
Aale Ahmad Suroor
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jannat shayari
दिन जल्दी जल्दी चलता हो तब देख बहारें जाड़े की
और पाला बर्फ़ पिघलता हो तब देख बहारें जाड़े की
Nazeer Akbarabadi
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barf shayari
इक बर्फ़ सी जमी रहे दीवार-ओ-बाम पर
इक आग मेरे कमरे के अंदर लगी रहे
Salim Saleem
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काश ऐसा कोई मंज़र होता
मेरे काँधे पे तेरा सर होता
Tahir Faraz
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इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है
Dushyant Kumar
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छोड़ कर जाने का मंज़र याद है
हर सितम तेरा सितमगर याद है

अपना बचपन भूल बैठा हूँ मगर
अब भी तेरा रोल नंबर याद है
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Salman Zafar
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हम आसमाँ के लोग थे जन्नत से आए थे
ख़ुद को मगर ज़मीं में बोना पड़ा हमें
Abbas Qamar
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इतना तो ज़िन्दगी में किसी के ख़लल पड़े
हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े

जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क
यूँँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े
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Kaifi Azmi
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पुरानी कश्ती को पार ले कर फ़क़त हमारा हुनर गया है
नए खेवइये कहीं न समझें नदी का पानी उतर गया है
Uday Pratap Singh
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एक ही नदी के हैं ये दो किनारे दोस्तो
दोस्ताना ज़िंदगी से मौत से यारी रखो
Rahat Indori
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मेरे जिस्म से वक़्त ने कपड़े नोच लिए
मंज़र मंज़र ख़ुद मेरी पोशाक हुआ
Azm Shakri
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दिल को सुकून रूह को आराम आ गया
मौत आ गई कि दोस्त का पैग़ाम आ गया
Jigar Moradabadi
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हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है
Mirza Ghalib
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जो चराग़ सारे बुझा चुके उन्हें इंतिज़ार कहाँ रहा
ये सुकूँ का दौर-ए-शदीद है कोई बे-क़रार कहाँ रहा
Ada Jafarey
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इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े
हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े
Kaifi Azmi
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'इंशा'-जी उठो अब कूच करो इस शहर में जी को लगाना क्या
वहशी को सुकूँ से क्या मतलब जोगी का नगर में ठिकाना क्या
Ibn E Insha
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बे तेरे क्या वहशत हम को तुझ बिन कैसा सब्र-ओ-सुकूँ
तू ही अपना शहर है जानी तू ही अपना सहरा है
Ibn E Insha
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इसी दुनिया में दिखा दें तुम्हें जन्नत की बहार
शैख़ जी तुम भी ज़रा कू-ए-बुताँ तक आओ
Ali Sardar Jafri
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उम्र-भर के सज्दों से मिल नहीं सकी जन्नत
ख़ुल्द से निकलने को इक गुनाह काफ़ी है
Ambreen Haseeb Ambar
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शब को मय ख़ूब सी पी सुब्ह को तौबा कर ली
रिंद के रिंद रहे हाथ से जन्नत न गई
Jaleel Manikpuri
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थोड़ा सा अक्स चाँद के पैकर में डाल दे
तू आ के जान रात के मंज़र में डाल दे
Kaif Bhopali
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सुकून क़ल्ब को जिस से मिल जाए 'ताबाँ'
ग़ज़ल कोई ऐसी सुना दीजिएगा
Anwar Taban
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कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं
गाते गाते लोग चिल्लाने लगे हैं
Dushyant Kumar
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जैसा मूड हो वैसा मंज़र होता है
मौसम तो इंसान के अंदर होता है
Aziz Ejaaz
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कोई समुन्दर, कोई नदी होती, कोई दरिया होता
हम जितने प्यासे थे हमारा एक गिलास से क्या होता?
Tehzeeb Hafi
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कोई समुंदर, कोई नदी होती कोई दरिया होता
हम जितने प्यासे थे हमारा एक गिलास से क्या होता

ता'ने देने से और हम पे शक करने से बेहतर था
गले लगा के तुम ने हिजरत का दुख बाट लिया होता
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Tehzeeb Hafi
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मैं इस ख़याल से शर्मिंदगी में डूब गया
कि मेरे होते हुए वो नदी में डूब गया
Siraj Faisal Khan
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नहीं हर चंद किसी गुम-शुदा जन्नत की तलाश
इक न इक ख़ुल्द-ए-तरब-नाक का अरमाँ है ज़रूर

बज़्म-ए-दोशंबा की हसरत तो नहीं है मुझ को
मेरी नज़रों में कोई और शबिस्ताँ है ज़रूर
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Asrar Ul Haq Majaz
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एक दफ़ा बस वापस मंज़र ऐसा हो
हाथ मेरा सीधा और उल्टा तेरा हो
Tanoj Dadhich
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मत पूछो कितना ग़मगीं हूँ गंगा जी और जमुना जी
ज़्यादा तुम को याद नहीं हूँ गंगा जी और जमुना जी

अमरोहे में बान नदी के पास जो लड़का रहता था
अब वो कहाँ है मैं तो वहीं हूँ गंगा जी और जमुना जी
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Jaun Elia
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चलती फिरती हुई आँखों से अज़ाँ देखी है
मैं ने जन्नत तो नहीं देखी है माँ देखी है
Munawwar Rana
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इसीलिए मैं बिछड़ने पर सोगवार नहीं,
सुकून पहली ज़रूरत है, तेरा प्यार नहीं!

जवाब ढ़ूंढ़ने में उम्र मत गँवा देना,
सवाल करती है दुनिया पर एतबार नहीं
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Balmohan Pandey
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मुझ को थकने नहीं देता ये ज़रूरत का पहाड़
मेरे बच्चे मुझे बूढ़ा नहीं होने देते
Meraj Faizabadi
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इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है
Dushyant Kumar
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निगाहों के तक़ाज़े चैन से मरने नहीं देते
यहाँ मंज़र ही ऐसे हैं कि दिल भरने नहीं देते

हमीं उन से उमीदें आसमाँ छूने की करते हैं
हमीं बच्चों को अपने फ़ैसले करने नहीं देते
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Waseem Barelvi
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इक रोज़ इक नदी के किनारे मिलेंगे हम
इक दूसरे से अपना पता पूछते हुए
Shahbaz Rizvi
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पस-मंज़र में 'फ़ीड' हुए जाते हैं इंसानी किरदार
फ़ोकस में रफ़्ता रफ़्ता शैतान उभरता आता है
Abdul Ahad Saaz
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ज़रा पाने की चाहत में बहुत कुछ छूट जाता है
नदी का साथ देता हूँ समुंदर रूठ जाता है
Aalok Shrivastav
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नहीं तो बर्फ़ सा पानी तुम्हें जला देगा
गिलास लेते हुए उँगलियाँ न छू लेना
Irfan Siddiqi
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बस्ती बस्ती ख़ाक उड़ाये, बस वहशत का मारा हो
उस सेे इश्क़ की आस न करना जिस का मन बंजारा हो

ख़ुद को शाइ'र कहते रहना दिल को लाख सुकूँ दे दे
लेकिन दुनिया की नज़रों में तुम अब भी आवारा हो
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Daagh Aligarhi
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क्या वाक़ई वो तेरी पाज़ेब की खनक थी
ऐसा सुकून तो बस नुसरत के गाने में है
Neeraj Neer
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नए साल में पिछली नफ़रत भुला दें
चलो अपनी दुनिया को जन्नत बना दें
Unknown
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ऐ मिरी ज़ात के सुकूँ आ जा
थम न जाए कहीं जुनूँ आ जा

इस से पहले कि मैं अज़िय्यत में
अपनी आँखों को नोच लूँ आ जा
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Fareeha Naqvi
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कहाँ कहाँ पे उसे ढूँढ़ते हैं हम यारों
किसी के लम्स से होता था जो सुकूँ दिल को
Afzal Ali Afzal
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सुकून ए क़ल्ब होता है मुयस्सर
तेरा जब नाम आता है लबों पर
Kiran K
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ये इश्क़ आग है और वो बदन शरारा है
ये सर्द बर्फ़ सा लड़का पिघलने वाला है
Shadab Asghar
हमेशा साथ सबके तो ख़ुदा भी रह नहीं सकता
बना कर औरतें उस ने ज़मीं को यूँँ किया जन्नत
Anukriti 'Tabassum'
जिस शाने पर सर रखते हो उस शाने पर सो जाते हो
जाने कैसे दीदावर हो हर मंज़र में खो जाते हो
Poonam Yadav
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अब आ भी जाओ के सुकूंँ मिले मुझे
अगर जो जाना था तो क्यूँँंँ मिले मुझे

ज़माना हो न हो रकी़ब बीच में
तू अब कभी मिले तो यूँंँ मिले मुझे
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Faiz Ahmad
देख कर हर कोई बेकार समझ ले मुझ को
अपनी उल्फ़त में गिरफ़्तार समझ ले मुझ को

बिना उस के तिरी जन्नत मुझे मंज़ूर नहीं
तू मिरी मान गुनहगार समझ ले मुझ को
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Faiz Ahmad
कम अज़ कम इक ज़माना चाहता हूँ
कि तुम को भूल जाना चाहता हूँ

ख़ुदारा मुझ को तन्हा छोड़ दीजे
मैं खुल कर मुस्कुराना चाहता हूँ

सरासर आप हूँ मद्दे मुक़ाबिल
ख़ुदी ख़ुद को हराना चाहता हूँ

मेरे हक़ में उरूस-ए-शब है मक़्तल
सो उस से लब मिलाना चाहता हूँ

ये आलम है, कि अपने ही लहू में
सरासर डूब जाना चाहता हूँ

सुना है तोड़ते हो दिल सभों का
सो तुम से दिल लगाना चाहता हूँ

उसी बज़्म-ए-तरब की आरज़ू है
वही मंज़र पुराना चाहता हूँ

नज़र से तीर फैंको हो, सो मैं भी
जिगर पर तीर खाना चाहता हूँ

चराग़ों को पयाम-ए-ख़ामुशी दे
तेरे नज़दीक आना चाहता हूँ
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Kazim Rizvi
तुम मुझे उतनी ही प्यारी हो मेरी जाँ
जितना प्यारा है कश्मीर इस देश को
Alankrat Srivastava
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अगर जन्नत मिला करती फ़क़त सज्दों के बदले में
तो फिर इबलीस मुर्शिद सब सेे पहले जन्नती होता
Shajar Abbas
फ़र्त-ए-ख़ुशी से अपनी जो भी रश्क करते हैं
उन को तिरी बनाई वो जन्नत तलब नहीं
Sabir Hussain
मैं सालों बा'द जब भी गाँव जाता हूँ
लिए पीपल की ठंडी छाँव जाता हूँ

कहीं मैली न हो जाए ये जन्नत
मैं माँ के पास नंगे पाँव जाता हूँ
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Ashok Sagar
झुके तो जन्नत उठे तो ख़ंजर
करेंगी हम को तबाह आँखें
Parul Singh "Noor"
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नदी को कोसते हैं सब किसी के डूब जाने पर
नदी में डूबते को पर कोई तिनका नहीं देता
Alankrat Srivastava
घर से निकले हुए बेटों का मुक़द्दर मालूम
माँ के क़दमों में भी जन्नत नहीं मिलने वाली
Iftikhar Arif
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है दुआ जल्दी जन्नत अता हो तुझे
तू मेरे इश्क़ का इश्क़ है ऐ रक़ीब
Prit
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और भी दुनिया में मंज़र ख़ूब-सूरत हैं मगर
तेरी ज़ुल्फ़ों झटकने से सुहाना कुछ नहीं
Alankrat Srivastava
साथ चलते जा रहे हैं पास आ सकते नहीं
इक नदी के दो किनारों को मिला सकते नहीं

उस की भी मजबूरियाँ हैं मेरी भी मजबूरियाँ
रोज़ मिलते हैं मगर घर में बता सकते नहीं
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Bashir Badr
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दिन ढल गया और रात गुज़रने की आस में
सूरज नदी में डूब गया, हम गिलास में
Rahat Indori
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दानिशमंदों रस्ता बतला सकते हो
दीवाना हूँ वीराने तक जाना है

जन्नत वाले थोड़ा पहले उतरेंगे
रिन्दों को तो मयख़ाने तक जाना है
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Vishal Bagh
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मंज़र बना हुआ हूँ नज़ारे के साथ मैं
कितनी नज़र मिलाऊँ सितारे के साथ मैं

दरिया से एक घूँट उठाने के वास्ते
भागा हूँ कितनी दूर किनारे के साथ मैं
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Khalid Sajjad
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उतरी हुई नदी को समुंदर कहेगा कौन
सत्तर अगर हैं आप बहत्तर कहेगा कौन

पपलू से उन की बीवी ने कल रात कह दिया
मैं देखती हूँ आप को शौहर कहेगा कौन
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Paplu Lucknawi
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जन्नत में आ गया था किसी अप्सरा पे दिल
जिस की सज़ा-ए-मौत में दुनिया मिली मुझे
Ankit Maurya
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सुकून देती थी तब मुझ को वस्ल की सिगरेट
अब उस के हिज्र के फ़िल्टर से होंठ जलते हैं
Upendra Bajpai
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पत्थर दिल के आँसू ऐसे बहते हैं
जैसे इक पर्वत से नदी निकलती है
Shobhit Dixit
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उसी वक़्त अपने क़दम मोड़ लेना
नदी पार से जब इशारा करूँँगा
Siddharth Saaz
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पिघलती बर्फ़ की ये दास्ताँ हम को बताती है
जुदा होना ही पड़ता है यहाँ पानी को पानी से
Raj Tiwari
तेरी आँखों में सारे मनज़र हैं
हम कहाँ हैं, कहाँ थे, कब होंगे
Meem Alif Shaz
एक ही शख़्स नहीं होता सदा दिल का सुकूँ
एक करवट पे कभी नींद नहीं आ सकती
Rehan Mirza
छोड़कर तन्हा मुझे जन्नत में रहने लग गए हो
और मैं ने ज़िन्दगीं कर ली जहन्नम शा'इरी में
"Nadeem khan' Kaavish"
नदी आँखें भँवर ज़ुल्फ़ें कहाँ तैरूँ कहाँ डूबूँ
कि तेरे शहर में सब की अदाएँ एक जैसी हैं
Divyansh "Dard" Akbarabadi
सदा लपेट के दिल जाएँगे वगरना नहीं
पहाड़ आह से हिल जाएँगे वगरना नहीं

वो आज दरिया से लड़ने की ठान कर गए थे
कहीं किनारे पे मिल जाएँगे वगरना नहीं
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Nadeem Bhabha
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नई नई आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है
कुछ दिन शहर में घू
में लेकिन अब घर अच्छा लगता है
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Nida Fazli
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उसूली तौर पे मर जाना चाहिए था मगर
मुझे सुकून मिला है तुझे जुदा कर के
Ali Zaryoun
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न तीर्थ जा कर न धर्म ग्रंथो का सार पा कर
सुकूँ मिला है मुझे तो बस तेरा प्यार पा कर

ग़रीब बच्चे किताब पढ़ कर सँवर रहे हैं
अमीर लड़के बिगड़ रहे हैं दुलार पा कर
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Alankrat Srivastava
मुसीबतों में तो याद करते ही हैं किसी को ये लोग सारे
मगर कभी जो सुकूँ में आए ख़याल मेरा तो लौट आना
Hasan Raqim
जब बात वफ़ा की आती है जब मंज़र रंग बदलता है
और बात बिगड़ने लगती है वो फिर इक वा'दा करते हैं
Afeef siraj
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तेरे बग़ैर ख़ुदा की क़सम सुकून नहीं
सफ़ेद बाल हुए हैं हमारा ख़ून नहीं

न हम ही लौंडे लपाड़ी न कच्ची उम्र का वो
ये सोचा समझा हुआ इश्क़ है जुनून नहीं
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Shamim Abbas
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हुआ जो इश्क़ तो वो रोज़ ओ शब को भूल गए
वो अपने इश्क़ ए नुमाइश में सब को भूल गए

कहाँ वो दुनिया में आए थे बंदगी के लिए
मिला सुकून जहाँ में तो रब को भूल गए
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Hameed Sarwar Bahraichi
अभी तो शाम की दस्तक हुई है
अभी से लग गया बिस्तर हमारा

यही तन्हाई है जन्नत हमारी
इसी जन्नत में है अब घर हमारा
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Vikas Sharma Raaz
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ये नदी वर्ना तो कब की पार थी
मेरे रस्ते में अना दीवार थी

आप को क्या इल्म है इस बात का
ज़िंदगी मुश्किल नहीं दुश्वार थी

थीं कमानें दुश्मनों के हाथ में
और मेरे हाथ में तलवार थी

जल गए इक रोज़ सूरज से चराग़
रौशनी को रौशनी दरकार थी

आज दुनिया के लबों पर मुहर है
कल तलक हाँ साहब-ए-गुफ़्तार थी
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ARahman Ansari
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ज़मीं पे घर बनाया है मगर जन्नत में रहते हैं
हमारी ख़ुश-नसीबी है कि हम भारत में रहते हैं
Mehshar Afridi
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मिरे माँ बाप जन्नत से नज़र रखते हैं मुझ पर अब
मिरे दिल में यतीमों के लिए इक ख़ास कोना है
Amaan Pathan
माँ के क़दमों के निशाँ हैं कि दिए रौशन हैं
ग़ौर से देख यहीं पर कहीं जन्नत होगी
Rahat Indori
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उठो ये मंज़र-ए-शब-ताब देखने के लिए
कि नींद शर्त नहीं ख़्वाब देखने के लिए
Irfan Siddiqi
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दरिया हो या पहाड़ हो टकराना चाहिए
जब तक न साँस टूटे जिए जाना चाहिए
Nida Fazli
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हम को न मिल सका तो फ़क़त इक सुकून-ए-दिल
ऐ ज़िंदगी वगरना ज़माने में क्या न था
Azad Ansari
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क़सम ख़ुदा की बड़े तजरबे से कहता हूँ
गुनाह करने में लज़्ज़त तो है सुकून नहीं
Mehshar Afridi
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न इंतिज़ार करो इनका ऐ अज़ा-दारो
शहीद जाते हैं जन्नत को घर नहीं आते
Sabir Zafar
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मुझ से अब लोग कम ही मिलते हैं
यूँँ भी मैं हट गया हूँ मंज़र से
Jaun Elia
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मुसीबत का पहाड़ आख़िर किसी दिन कट ही जाएगा
मुझे सर मार कर तेशे से मर जाना नहीं आता
Yagana Changezi
ये किस अज़ाब में छोड़ा है तू ने इस दिल को
सुकून याद में तेरी न भूलने में क़रार
Shohrat Bukhari
अपनी आँखों में 'क़मर' झाँक के कैसे देखूँ
मुझ से देखे हुए मंज़र नहीं देखे जाते
Khalil Ur Rehman Qamar
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बेचता यूँँ ही नहीं है आदमी ईमान को
भूख ले जाती है ऐसे मोड़ पर इंसान को

शबनमी होंठों की गर्मी दे न पाएगी सुकून
पेट के भूगोल में उलझे हुए इंसान को
Read Full
Adam Gondvi
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एक तेरा ही तबस्सुम तो न था वजह-ए-सुकूँ
मेरे आँसू भी मोहब्बत में बहुत काम आए
Mushfiq Khwaja
यही जन्नत है जो हासिल हो सुकून-ए-ख़ातिर
और दोज़ख़ यही दुनिया अगर आराम नहीं
Safi Lakhnavi
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बचा लिया मुझे ग़र्क़ाब होने से उस ने
जुनून ए इश्क़ है लाया नदी के पार मुझे
Amaan Pathan
वो एक अश्क जो हासिल है ज़िंदगानी का
तमाम उम्र के मंज़र निचोड़ कर निकला
Ameer Imam
कोई हमें रखे न रखे याद ऐ वतन
दिल में सुकून है कि तेरे कुछ तो काम आए
Haresh Vanza
फिर उम्र भर कभी न सुकूँ पा सका ये दिल
कटने थे जो भी कट गए राहत में चार दिन
A G Josh
फूल महकेंगे यूँ ही चाँद यूँ ही चमकेगा
तेरे होते हुए मंज़र को हसीं रहना है
Ashfaq Hussain
तू कहानी के बदलते हुए मंज़र को समझ
ख़ून रोते हुए किरदार की जानिब मत देख
Azhar Abbas
हर ज़रुरत पहाड़ है अब तो
उम्र जबसे ढलान पर आई
Shakir Dehlvi
मैं सूरज था, रौशनी का चाँद के लिए ढल गया
मैं पानी था नदी का पेड़ों के लिए रुक गया

मैं पत्ता था पेड़ों का टहनियों के लिए सुख गया
मैं टहनी था जंगल का सूरज के इंतिज़ार में जल गया
Read Full
Animesh Choubey