Falak Shayari - Aasman, khwaab aur unchi soch ki shayari collection

Falak shayari beautifully captures the vastness of the sky and the depth of human dreams. It reflects emotions tied to aasman, hopes, and limitless possibilities. Whether it's about ambition, love, or solitude, falak-themed poetry adds a sense of elevation and wonder to every line.

मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसों
तब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं
Meer Taqi Meer
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वो जंग जिस में मुक़ाबिल रहे ज़मीर मिरा
मुझे वो जीत भी 'अंबर' न होगी हार से कम
Ambreen Haseeb Ambar
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देख तो दिल कि जाँ से उठता है
ये धुआँ सा कहाँ से उठता है

गोर किस दिल-जले की है ये फ़लक
शो'ला इक सुब्ह यां से उठता है
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Meer Taqi Meer
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ज़मीन-ओ-आसमाँ को जगमगा दो रौशनी से
दिसम्बर आज मिलने जा रहा है जनवरी से
Bhaskar Shukla
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पहले सर की ये शिकायत थी फ़लक ऊँचा है
अब मिरे पाँव ये कहते हैं कि धरती है कहाँ
Rauf Raza
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ये लाल शा
में ये लाल अंबर ये लाल सूरज चमक रहा है
मुझे बता दो कहाँ है खोई तिरे लबों की ये सुर्ख़ लाली
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Anmol Mishra
फ़लक इतना सूना है क्यूँ
ज़मीं पर तो सब मेरे थे
Parul Singh "Noor"
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तेरे दामन में सितारे हैं तो होंगे ऐ फ़लक
मुझ को अपनी माँ की मैली ओढ़नी अच्छी लगी
Munawwar Rana
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कभी वो पास तो कभी इतनी दूर लगती है
कभी इस जहाँ की तो कभी अंबर की हूर लगती है
Kumar Rishi
नीले अंबर सी कुर्ती में, जब भी मुझ को दिखती हो
और तुम्हारा चेहरा फिर तो, बिल्कुल चाँद सा लगता है
Anurudh kumar shastri
सुनो जैसे फ़लक में चाँद का होना ज़रूरी है
ग़ज़ल के वास्ते साहिब मेरा होना ज़रूरी है
Saarthi Baidyanath
ज़ुदा हम हो गए अफ़सोस कैसा
फ़लक धरती से कब लिपटा दिखा है
Atul K Rai
फ़क़त घूंघट में ही रहना नहीं है
गगन छूना है हर लड़की को साहब
Kush Pandey ' Saarang '
उड़ना है अब ग़ज़ल के फ़लक पर मुझे.
मैं परिंदा हूँ आजाद से ख़याल का
Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
तुम धरा पर बैठ कर सपने गगन के पालते हो
है विजय की चाह तो क्यूँ काम कल पर टालते हो

और अंदाज़ा नदी का छोर पर मिलता नहीं है
कूद कर देखो न डर क्यूँ डूबने का पालते हो
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ATUL SINGH
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वो क्या अगर सब गुफ़्तगू खुद सेे किए हम जा रहे
ना दिख बुतों में और ना ही दिख फ़लक में वो ख़ुदा
Zain Aalamgir
बुरा या फिर कभी अच्छा लगा मैं
जो जैसे थे उन्हें वैसा लगा मैं

निकाला मैं गया हूँ इस फ़लक से
बता तू अब तुझे कैसा लगा मैं
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Shivam Shaw
बड़ी हैरत में हैं तारे गगन के
कोई जुगनू सितारा हो रहा है
Saarthi Baidyanath
मता-ए-जाँ रुख़-ए-अनवर तुम्हारा
फ़लक के चाँद से ज़्यादा हसीं हैं
Shajar Abbas
तुम फ़लक हो और तुम ही सर
ज़मीं हो जानेमन
मैं जहाँ जाऊँ वहाँ पर बस तुम्हीं हो जानेमन

मैं तुम्हारे दिल से निकला और ठोकर में गया
तुम मेरे दिल में थी कल अब भी वहीं हो जानेमन
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Chandan Sharma
कहाँ हैं आलम-ए-इंसाँ के वालियों मौला
फ़लक ज़दा हूँ मैं मुश्किल कुशाई कर मेरी
Shajar Abbas
उतर आजा फ़लक से अब ज़मीं पे
सदा कोई न आएगी कहीं से
Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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इस दुनिया की रीति-रस्में न जाने क्यूँ ऐसी हैं
धर्म -जाति संग प्यार पिसेगा ये अफवाएँ कैसी हैं

दूर क्षितिज पर मिलते तो है मिलन मगर नामुमकिन है
तेरी-मेरी हालत जानम धरती अंबर जैसी हैं
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Sanya rai
कोई पूछे कि बतलाओ किसे तुम इश्क़ कहते हो
तो कह देना उदासी के फ़लक पे दर्द का इक चाँद
Intzar Akhtar
वतन का दुलारा गया आसमाँ को
कि कितनों का प्यारा गया आसमाँ को

ज़मीं ने सितारे लुटाए फ़लक पे
ज़मीं से सँवारा गया आसमाँ को
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Chandan Sharma
चाँद अंबर के सितारे
एक टक तुम को निहारे

तुम भला चुनती हमें क्यूँ
पथ नहीं थे हम तुम्हारे
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Naimish trivedi
मैं किस तरह उसे जताता प्यार है मुझे कि मैं
फ़लक से चाँद तारे तोड़ कर भी ला नहीं सका
Hasan Raqim
रंग लाई है किरन की आ
समाँ से इल्तिमास
चाँद आया है फ़लक से आज आंगन में मिरे
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Kiran K
मेरी ख़्वाहिश पर जो टूटे
अंबर का वो तारा तुम हो
Reshma Shaikh
रौनक फ़लकी होकर हम चाँद गगन पे आए है
सच अब किस सेे बोले हम जान लुटाने आए है
Raunak Karn
तरकीब हज़ारों हैं लेकिन बोसा पहले नंबर पर
पेशानी पर ले लो जब ग़ुस्सा रहता है अंबर पर
Sandeep dabral 'sendy'
ज़रा सा कश्मकश में हूँ ज़मीं पर देख कर तुझ को
फ़लक पर यार तुझ को तो चमकना चाहिए था ना
Shoonya Shrey
पूछता है फ़लक से दीवाना
टूट कर गिर गया सितारा क्या
Ajeetendra Aazi Tamaam
फुटपाथों पर सोने वालों की नज़रों में अंबर है
मख़मल पर पलने वाले हर सपने की हद होती है
Upendra Bajpai
सुनाता है समुंदर इक कहानी हर किनारे पर
कभी कोई तो आया था बनाने घर किनारे पर

फ़लक से चाँद उतरा रक़्स करते इस समुंदर में
सितारे देखने आए वही मंज़र किनारे पर
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Raj Tiwari
फ़लक से वो उतर कर आ गया है
कि अब तो चाँद भी शरमा गया है
Arohi Tripathi
तुम कहो तोड़ के फ़लक से सभी
चाँद तारे ज़मीं पे ले आऊँ
Shajar Abbas
ज़मीं गिरने नहीं देती गगन उठने नहीं देता
हर इक हद तोड़ना चाहे मिरे अंदर का पागलपन
Ajeetendra Aazi Tamaam
ख़्वाबों का गुलदान मिलेगा जाने कब
वो सपना अरमान मिलेगा जाने कब

जिस के लिए दिल कब से धड़-धड़ धड़के है
मुझ को वो बईमान मिलेगा जाने कब

देखा जाता है बस भूखी नज़रों से
नारी को सम्मान मिलेगा जाने कब

तू भी 'अंबर' श्रद्धा भक्ती रक्खा कर
कहते हैं भगवान मिलेगा जाने कब
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Ambar
इस एक फ़िक्र ने हैरान कर दिया है मुझे
फ़लक पे चाँद तो आया है तुम नहीं आए
Talha Lakhnavi
ख़ून कम होने लगे मुफ़लिस का तब
जब गगन में मेघ छाने लगते हैं
Sandeep dabral 'sendy'
ख़ुदा की देन है और ये फ़लक से नाज़िल है
हमारे ग़म को मुसलसल उरूज़ हासिल है
Navneet krishna
अपने पर्वत को पाने में
बन के अंबर, सागर निकले

अब सावन बरसे जितना भी
पर तुझ बिन छत बंजर निकले
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Divya 'Kumar Sahab'
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"शहीद-ए-आज़म भगतसिंह"
आँखों में वो आँसू नहीं

कुछ ख़्वाब सँजोया करता था
वतन की आज़ादी के ख़ातिर

खूनी आँसू रोया करता था
आज़ादी का दीवाना था वो

रगों में उबाल ख़ानदानी था
जिस ने सब कुछ लुटा दिया अपना

वो वीर भगत बलिदानी था
अंगारों पर चल कर जिस ने

एक नई राह बनाई थी
उस मतवाले शे'र ने क़सम

आज़ादी की खाई थी
चाहे उम्र कम रही हो लेकिन

वो एक लंबी कहानी था
जिस ने सब कुछ लुटा दिया अपना

वो वीर भगत बलिदानी था
जिस के दिल में सिर्फ़ और सिर्फ़

इन्कलाब की आग थी
आँखों में थी जलती ज्वाला

लिबास जिस का त्याग थी
हर दिल में निशाँ छोड़ गया वो

भारत माँ की निशानी था
जिस ने सब कुछ लुटा दिया अपना

वो वीर भगत बलिदानी था
जब तक धरती-अम्बर होंगे

मिट न सकेगा नाम तुम्हारा
भारत का हर बच्चा-बच्चा

याद रखेगा काम तुम्हारा
समुंदर से भी गहरा था जो

ख़ुद में ही एक रवानी था
जिस ने सब कुछ लुटा दिया अपना

वो वीर भगत बलिदानी था
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"Nadeem khan' Kaavish"
फ़लक में चाँद के जैसे,रहे मुझ में कहीं मौजूद
कभी आधी, कभी पौनी, कभी पूरी, उदासी है
Vishal Vaid
सभी हैरत करेंगे जब नई पहचान लिख देंगे
फ़लक पर भी हुनर से अपने हिंदुस्तान लिख देंगे
ATUL SINGH
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फ़लक पे जो सितारें हैं वो प्यारे हैं
ख़ुदा से हो मोहब्बत तो हमारे हैं
Meem Alif Shaz
जान-ए-तमन्ना हम ने तब तब तुम्हें पुकारा
रंग-ए-फ़लक से टूटा जब जब कोई सितारा
Kartik tripathi
जब प्राण पखेरू चल पड़ते हैं गगन की ओर
तब साँस नहीं रहती एहसास नहीं रहते
Sandeep dabral 'sendy'
युगों युगों से शहादतों की
जहाँ बही है अतुल्य गंगा

धरा पे टिक कर गगन से ऊँचा
वहीं दमकता मेरा तिरंगा
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Rudransh
ज़मीं सर पे उठा लूँगा उस इक लड़की की ख़ातिर मैं
गगन को भी कुचल दूँगा उस इक लड़की की ख़ातिर मैं

भला औक़ात क्या इस चाँद की उस चाँद के आगे
हज़ारों चाँद वारूँगा उस इक लड़की की ख़ातिर मैं
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Sandeep Singh Chouhan "Shafaq"
तीरगी से पस्त लोग बरहना-पा आ गए हैं
अब फ़लक पे चाँद आया रात का जवाब आया
pankaj pundir
फ़लक भी सर-निगूँ तकने लगा है
हम अपने पाँव पर चलने लगे हैं
Sohil Barelvi
इन आँखों ने हर मंज़र याद रखा है
छूके अंबर अपना घर याद रखा है

शायद उस का चेहरा मैं भूल चुका हूँ
उस का नंबर अब भी पर याद रखा है
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Adarsh Akshar
फ़लक के चाँद, सूरज और अंजुम से नहीं मिलते
चमकते है मगर तेरे तबस्सुम से नहीं मिलते

तुम्हारे चेहरे से ही हु-ब-हू ये मेल खाते है
मेरी ग़ज़लें जो मेरे ही तरन्नुम से नहीं मिलते
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maqbul alam
न अंबर न ही मैं चमकता सितारा
हूँ माँझी किसी का किसी का किनारा
Manohar Shimpi
यहाँ धरती से अंबर को मिलाए वो मुहब्बत है
फ़क़त जो आदमी को रब बनाए वो मुहब्बत है

कभी इस प्रेम में राधा दिवानी श्याम की जैसे
कभी उस श्याम में मीरा समाए वो मुहब्बत है
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Kamlesh Goyal
थे जो बातिल फ़लक पर मकीं हो गए
हक़ लिए मैं ज़मीं पर टहलता रहा
Javed Aslam
न बदली है ज़मीं ये और ये अंबर नहीं बदला
तुम्हारी याद बसती है तभी तो घर नहीं बदला

कहीं ऐसा न हो तुम याद कर लो इस सबब हम ने
बहुत बदले हैं मोबाइल मगर नंबर नहीं बदला
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A R Sahil "Aleeg"
न बदली है ज़मीं ये और ये अंबर नहीं बदला
तुम्हारी याद बसती है तभी तो घर नहीं बदला

न कर ले फ़ोन वो इक बे-वफ़ा सा इश्क़ भूले से
बहुत बदले हैं मोबाइल मगर नंबर नहीं बदला
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A R Sahil "Aleeg"
मैं चाहूँ तो अंबर के तारे गिन लूँ
उन के तन के तिल गिन पाना मुश्किल है
Ranjan Kumar Barnwal
किसी के ग़म में पागल हो गई हैं
हमारी आँखें बादल हो गई हैं

फ़लक से कोई चारा-गर उतारो
ज़मीं पर रूहें घाइल हो गई हैं
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Sanjay shajar
एक ज़िद्दी लड़का हासिल आपगा को कर रहा और
घूरता भी जा रहा है उस फ़लक को ग़ौर से अब
Vikas Shah musafir
चाँद तारे फ़लक पे चमकने लगे
यादों के चेहरे फिर से झलकने लगे

जब तिरी उँगलियों ने छुआ जिस्म को
मिट्टी के अंग सारे महकने लगे

धूप ने इस तरह से जलाया बदन
सारे मज़दूर सर को पटकने लगे

जब बड़ों की न मानी कभी कोई बात
बच्चे मंज़िल से अपनी भटकने लगे

जब सड़क पे निकल के वो आई परी
बूढ़ों के दिल भी धक धक धड़कने लगे

देख कर मलबे के नीचे मासूमों को
लोगों के आँसू टप टप टपकने लगे
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Meem Alif Shaz
वहाँ ऊपर ख़ला में कहकशाँ में कौन रहता है
फ़लक के पार जो है उस जहाँ में कौन रहता है

टहल आए हैं वैसे तो बशर हम चाँद तक लेकिन
सवाल अब भी वही है आसमाँ में कौन रहता है
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Mohit Subran
शोख़ ने क्या ही ज़ुल्फ़ लहराई
अज़-फ़लक बारिशें निकल आईं
Meem Maroof Ashraf
रात को हम कुछ सितारे रख के सोए थे गगन में
देर से जागे तो देखा कोई ले कर जा चुका है
Rishi Vishwakarma
कशिश है आप के चेहरे में ऐसी
फ़लक से चाँद तारे आ गए हैं
shampa andaliib
तुम्हें है क्या लेना देना
अंबर पागल है तो है
Ambar
निभाया आसमाँ ने इश्क़ धरती से तो सब बोले
ये अंबर भी ज़मीं के प्यार में बौरा गया था क्या
Nityanand Vajpayee
न जुगनू न चंदा न तारे कहो
मैं अंबर हूँ अंबर ही प्यारे कहो
Ambar
फ़लक में उदास हैं चाँद, सितारे सभी
वो लड़की आज छत पर नहीं आई
Akash Choudhary
फ़लक तलक ये मंज़िलें ज़मीं पे साँस जा रही
कुछ इस तरह ये ज़िंदगी है मुझ को आज़मा रही
Aman Tripathi
तुझे ख़बर भी है ऐ बे-वफ़ा हज़ारों ने
हयात काट दी रो रो के ग़म के मारों ने

मिलूँ मैं चाँद से अपने तो किस तरह से मिलूँ
फ़लक को घेर लिया है कई सितारों ने
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Zeeshan kaavish
पिता के काँधे पर बैठा हुआ हूँ
गगन छूने को इक मौक़ा' मिला है
Shivsagar Sahar
फिर से तड़पा है मन आ मुझे प्यार कर
कह रहा ये गगन आ मुझे प्यार कर

तुम ने देखा कटीले नयन से तो फिर
झूम उठा ये बदन आ मुझे प्यार कर
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Murari Mandal
चलो छोड़ो वो शिकवे और शिकायत भूल भी जाओ
चले आओ हमें मिलने कि अंबर याद करता है
Ambar
चलो उस की तरफ़ से भी इशारे बन गए हैं
मेरी पिछली मुहब्बत के किनारे बन गए हैं

उछाले थे जो कल की रात उस की ओर मैं ने
मेरे जुगनू तो अंबर में सितारे बन गए हैं
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Neeraj Nainkwal
सफ़र ज़मीं का तमाम होगा सफ़र फ़लक का करूँँगा मैं भी
यही तो अब इक ख़ुशी बची है कि एक दिन तो मरूँगा मैं भी
Mohit Subran
फ़लक के चाँद की क्या दीद वो तो है ज़माने का
दिखे जो चाँद मेरा वो मुबारक ईद हो जाए
Abha sethi
चल आ मैं तुझे चाँद तारे दिखाऊँ
ज़मीं से फ़लक के नज़ारे दिखाऊँ
ABhishek Parashar
कोई तो कह रहा था चाँद सा चेहरा है तेरा फिर
फ़लक के सब सितारे तुझ को मिल कर देखते होंगे
Manish Yadav
ले के सहारा सच्चाई का मंचों पर
अंदर की सब राज़ दलाली खोल दिया

नेहा जी ने अंबर जी को सलीक़े से
मुँह पे यूँँ सरकारी औरत बोल दिया
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Danish Balliavi
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ये खिलखिलाती हसीन दुनिया ये बात करते हसीं सितारे
ये कह रहे हैं उठो मुसाफ़िर फ़लक झुकाओ क़दम बढ़ाओ
DEVANSH TIWARI
आसमाँ में अब्र है तो चाँद तारे भी दिखेंगे
रोज़ आते माँ के आँचल में मुझे मिलने फ़लक से
Manohar Shimpi
पिता बच्चों की हर विश पूरी करने में लगा है
गगन जैसी भी ख़्वाहिश पूरी करने में लगा है
"Dharam" Barot
अजब सा एक रिश्ता चाँद का अंबर के तारों से
कि बाग़ों का मिलन हो जैसे सावन में बहारों से

जहाँ में हाँ ज़बाँ कोई मुहब्बत की नहीं होती
बयाँ जज़्बात हो जाते हैं आँखों के इशारों से
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Shivang Tiwari
तेरी ज़ुल्फ़ों के पेच-ओ-ख़म में उलझे हैं वरना
इक दिन हम भी फ़लक पर होते बनके कोई सितारा
Meem Alif Shaz
फ़लक की आँख से भी शबनमी क़तरे टपकते हैं
सितारे यूँँ सुनाते हैं हमारी दास्ताँ अक्सर
Dharmesh bashar
देख कर हुस्न तिरा चाँद बहक जाता है
लड़खड़ाता हुआ अंबर से ढलक जाता है
ALI ZUHRI
मंज़िलें और भी हैं इक यही दर नहीं
ठान लो दिल में तो दूर अंबर नहीं
Sanjay Bhat
है अधूरा गगन बदलियों के बिना
घर सॅंवरते नहीं लड़कियों के बिना
Manish Yadav
तिरी ख़ुशी के लिए मैं नदी के आँचल में
फ़लक से चाँद सितारे उतार लाया हूँ
Shajar Abbas
अब फ़लक से तो नहीं कोई याँ आने वाला
फिर कोई टकराएगा तुझ से ज़माने वाला
Sohil Barelvi
दिल बाँध के रखा है रखा है फ़लक पे सर
मंज़िल तो दिख रही है मगर खो गया है घर
Sanjay Bhat
है अभी तो परिंदगी ज़िंदा
मैं गगन में उड़ा परिंदा हूँ
Vinod Ganeshpure
ख़ूब-सूरत आप हो यूँँ
चाँद जैसे है गगन में
Vinod Ganeshpure
राम तुम्हारे स्वागत में ये देखो तो
धरती अंबर चाँद सितारे हाजिर हैं
Nirbhay Nishchhal
मस्ती में बहता दरिया हूँ
अंबर मुझ को देखा करता
Shivangi Shivi
जो पंछी आज़ाद गगन में उड़ना चाहता है
उस पंछी के सपने में ही पिंजरे आते हैं
Sanskar Shrivastav
इक आँख सुकूँ है इक आँख आँसू
है फ़लक पर चाँद भी और सूरज भी
Chetan Verma
जहाँ तक दरख़्शाँ उछाले गए
वहीं तक ही उन के उजाले गए

हमीं ने क़बाहत उठाई थी जब
फ़लक को ज़मीं के इज़ाले गए
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Nikhil Tiwari 'Nazeel'
कोई धुन तारी नहीं कोई सनक बाक़ी नहीं
अब फ़लक को नाप आने की हुमक बाक़ी नहीं

अब नहीं वो तिश्नगी जिस को समुंदर चाहिए
मुझ में अब कुछ कर गुज़रने की ललक बाक़ी नहीं
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Sanjay
देखता रहता हूँ उस को मैं फ़लक-बीनों से
उस की आवाज़ भी आती है मिरे कानों में
Javed Aslam
अजब सी रौशनी बिखरी थी दरिया के किनारों में
फ़लक ने चाँद पिघला कर उतारा आबशारों में

बताते हैं वो इक मंज़र किसी जादूगरी सा था
अमाँ दिल हार बैठे थे कई उस दिन नज़ारों में
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Nikhil Tiwari 'Nazeel'
जहाँ बाम-ए-फ़लक पे चाँद चमका हो
वहाँ तारे भी अपना हक़ जताते हैं
Saba Rao
वरक़ पर आज के बरसों में ठहरा है फ़लक आओ
लिखें ज़िंदान में भी नज़्म हम उनवान जो भी हो
kapil verma
इस दुनिया से कूच किया है तो ये हासिल है अपना
दूर फ़लक पर तारों का इक जोड़ा और निखरना है
nakul kumar