Raqeeb Shayari - Ishq mein dushman, jealousy, aur love rival ki shayari

Raqeeb shayari captures the pain, jealousy, and silent rivalry in love when someone else stands between you and your beloved. It reflects emotions like hasad, heartbreak, and unspoken competition in ishq. These lines beautifully express the bitterness of love triangles and the ache of losing someone to a rival.

रक़ीब आ कर बताते हैं यहाँ तिल है वहाँ तिल है
हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले बहुत पहले
Anand Raj Singh
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मोहब्बत नेक-ओ-बद को सोचने दे ग़ैर-मुमकिन है
बढ़ी जब बे-ख़ुदी फिर कौन डरता है गुनाहों से
Arzoo Lakhnavi
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इस तरह ज़िंदगी ने दिया है हमारा साथ
जैसे कोई निबाह रहा हो रक़ीब से
Sahir Ludhianvi
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'शाद' ग़ैर-मुमकिन है शिकवा-ए-बुताँ मुझ से
मैं ने जिस से उल्फ़त की उस को बा-वफ़ा पाया
Shaad Arfi
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अगर लगता है वो क़ाबिल नहीं है
तो रिश्ता तोड़ना मुश्किल नहीं है

रक़ीब आया है मेरे शे'र सुनने
तो अब ये जंग है महफ़िल नहीं है
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Tanoj Dadhich
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अगर रक़ीब न होते तो दोस्त होते आप
हमारे शौक़, ख़यालात एक जैसे हैं
Amulya Mishra
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मजबूरी में रक़ीब ही बनना पड़ा मुझे
महबूब रहके मेरी जो इज़्ज़त नहीं हुई
Sabahat Urooj
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ख़ुदा के लिए अब न उस सेे मिलो तुम
तुम्हें अब हमारी जलन की क़सम है
Tanoj Dadhich
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कई दिन इस लिए भी क्लास में था ग़ैर-हाज़िर
बहाना चाहिए था उस सेे कॉपी माँगने का
Ankit Maurya
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लुत्फ़ आता है बहुत सोच के मुझ को कि रक़ीब
रंगत-ए-लब को तेरी पान समझते होंगे
Ameer Imam
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अब आ भी जाओ के सुकूंँ मिले मुझे
अगर जो जाना था तो क्यूँँंँ मिले मुझे

ज़माना हो न हो रकी़ब बीच में
तू अब कभी मिले तो यूँंँ मिले मुझे
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Faiz Ahmad
चले जाओ मगर इतनी मदद करते हुए जाओ
मैं तन्हा मर न जाऊँ दो अदद करते हुए जाओ

चराग़ों की जलन से ख़त्म हो जाती है तारीक़ी
हसद करते हुए आओ हसद करते हुए जाओ
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Muzdum Khan
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है दुआ जल्दी जन्नत अता हो तुझे
तू मेरे इश्क़ का इश्क़ है ऐ रक़ीब
Prit
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शराफ़त ने मुझ को कहीं का न छोड़ा
रक़ीब अपने ख़त मुझ सेे लिखवा रहे हैं
Rajesh Reddy
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तुम्हारे ख़त में नया इक सलाम किस का था
न था रक़ीब तो आख़िर वो नाम किस का था
Dagh Dehlvi
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मुझ को ये नज़र आया के वो एक बला है
कुछ ख़्वाब है कुछ अस्ल है कुछ तर्ज -ए- अदा है

वो ग़ैर की आग़ोश में रहने लगा शादाँ
उस को नहीं मालूम के दिल मेरा जला है
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Navneet krishna
जब सर-ए-शाम पजीराई-ए-फ़न होती है
शाहज़ादी को कनीज़ों से जलन होती है

ले तो आया हूँ तुझे घेर के अपनी जानिब
आगे इंसान की अपनी भी लगन होती है
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Azhar Faragh
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मैं तो मुद्दत से ग़ैर-हाज़िर हूँ
बस मेरा नाम है रजिस्टर में

याद करती हैं तुझ को दीवारें
शक्ल उभर आई है पलस्तर में
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Azhar Nawaz
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दयार-ए-ग़ैर में तुम ख़ुद से ख़ुद में तन्हा हो
जो तुम को चाहते थे अब भी चाहते होंगे
Mohit Dixit
उस ने छोड़ा है मुझे छोड़ते हैं जैसे लोग
बाढ़ के वक़्त सभी ग़ैर ज़रूरी सामान
Vishnu virat
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जीना वो क्या जो हो नफ़स-ए-ग़ैर पर मदार
शोहरत की ज़िंदगी का भरोसा भी छोड़ दे
Allama Iqbal
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यार हमारे दिल की जलन ज़ियादा है
तुम सिगरेट पे यूँँ ही लेक्चर देती हो
Shivam chaubey
इश्क़ में कुछ क़रीब क्या आया
मुझ से बिछड़ा, रकीब क्या आया
Kohar
हम ने छोड़ा तुम्हें था कह देंगे
ख़ुश रहो तुम रक़ीब शाद रहे
Ashutosh Kumar "Baagi"
वो शीरीनी मुझे महसूस होगी
वो जब भी ग़ैर को चूमा करेगी
Ashutosh Kumar "Baagi"
कैसे चलाऊँ गोली मैं
जब दोस्त ही रकीब है
karan singh rajput
मुझ से जलते हैं अगर लोग तो हैरत कैसी?
देख कर ख़ुद को मुझे ख़ुद ही जलन होती है
Ramnath Shodharthi
हसद से पाक अपना मन करो दीवाली आई है
मोहब्बत के दीए रौशन करो दीवाली आई है
Shajar Abbas
जलाओ न आँखें मेरी खोज में
जलन ये बुझा दो मैं दिख जाऊँगा
Abuzar kamaal
बन गई है, कल की शब ही, वो रक़ीब की अब दुल्हन
ख़त्म होना, अब तो तय है, उस रक़ीब के दिन अच्छे
A R Sahil "Aleeg"
जो मुझे छोड़कर तेरे पास आया है
मेरा महबूब ही तो नहीं, रब भी है

मुझ को बस इतना कहना है तुझ से रक़ीब
इश्क़ के साथ उस की इबादत भी कर
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Prit
वो मेरा हमख़याल भी है और क़रीब भी
या'नी वो मेरा दोस्त भी है और रक़ीब भी
junaid khan
चाह रक़ीब यहाँ रखते हैं अब उस के लब की
मैं तो केवल भूखा था उस की पेशानी का
Sandeep dabral 'sendy'
मैं तो था इक मामूली किरदार कहानी का
राजा तो था कोई और मियाँ उस रानी का

चाह रक़ीब यहाँ रखते हैं अब उस के लब की
मैं तो केवल भूखा था उस की पेशानी का
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Sandeep dabral 'sendy'
नफ़रतें वसवसे हसद किना
ये ही तोहफ़े दिए हैं अपनों ने
Harun Umar
पता था मुझे है रक़ीब
मिरे से ज़ियादा क़रीब
Akash Panwar
बन गई ग़ैर की दुल्हन वो, हुआ ख़त्म अब सब कुछ
उठ रहे हैं दुआ में अब भी मेरे हाथ जाने क्यूँ ?
A R Sahil "Aleeg"
वास्ते दस्त-बरदारी मुझ से, दिन भी चुना तो क्या
वो बनी फ़रवरी चौदह को किसी ग़ैर की दुल्हन
A R Sahil "Aleeg"
मैं ने इरशाद जिस को समझा था अपना
मुझे समझाया उस ने ग़ैर का मतलब
Irshad Siddique "Shibu"
गुलाल मत लगवाना उस रक़ीब से जाना
उस ने छूना है तेरे होंटों को जाना
Jasmeet singh 'Meet'
तू किसी ग़ैर-मुक़द्दर की ख़ुशी है लड़की
हम तुझे सोच के तो हँस भी नहीं सकते हैं
Aarush Sarkaar
ये सुनो! रकी़ब मेरा ले रहा मज़ा सनम का
ये अदा वो हम सेे ही सीख के तो गई थी यारों
RAAHI
ग़ैर से नाता जोड़ सकोगे सच में क्या
मुझ सेे रिश्ता तोड़ सकोगे सच में क्या

तुम सेे पहले जो भी मेरी दुनिया थी
तुम वो दुनिया मोड़ सकोगे सच में क्या
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Ambar
इक फ़क़त ग़म ही मिला वो भी कम इतना कि ‘सफ़र’
लिखना छोड़ूंँगा तो ‘ग़ालिब’ से जलन के मारे
SHIV SAFAR
मेरा रकी़ब ही तो मेरा हबीब है अब
मेरे सनम का वो अब चाहत जो हो गया है
RAAHI
इक राज़ से हमें अनजाना बना रखा है
उस ने तो ग़ैर को दीवाना बना रखा है
Satyam Bhaskar "Bulbul"
सुना रक़ीब तवज्जोह न अब उन्हें देते
इसी लिए वो हमारे क़रीब आए हैं
Sandeep dabral 'sendy'
ये नई चादर जो लाई जा रही है
तेरे बिस्तर पे बिछाई जा रही है

ख़ुश है ना तू ग़ैर रिश्ते में तभी बससज ये तेरी सजाई जा रही है
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Deep kamal panecha
कहा कुछ नहीं हमें उस ने रवानगी के पहले
सो हमारे लब भी चुप चुप रहे ख़ुद-कुशी के पहले

उसे याद आ गया कोई रक़ीब चार दिन बा'द
हमें मौत याद आने लगी ज़िंदगी के पहले
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Kinshu Sinha
दो लफ़्ज़ शा'इरी की बदल कर चुरा लिया
बारात ला, रक़ीब ने अपना बना लिया

चक्कर लगा लगा के भी मेरी नहीं हुई
मंडप के सात फेरे से रिश्ता बना लिया
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RAAHI
लव यूँ, लव यूँ बोल किया था पागल जिस ने
यारों रक़ीब को भी वो तड़पाया होगा
Vivek Vikrant Yadav
हाए वो तिल कि छोड़ो रहने दो
ग़ैर-वाजिब है तज़किरा करना
Upendra Bajpai
मेरे रक़ीब को तुम क्यूँ सताया करते हो
तरस भी खाओ ज़रा क्यूँ रुलाया करते हो
Danish Balliavi
हुस्न से पर्दा-ए-इस्मत को हटा बहर-ए-ख़ुदा
मुझ सेे नाबीना को तू तिश्ना-ए-दीदार न रख

ख़्वाब-ए-फ़र्दा में ये कहता हूँ रक़ीब-ए-जाँ से
तू मेरी जान के रुख़्सार पे रुख़्सार न रख
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Shajar Abbas
रश्क़ होता है चूमते हैं गाल
तेरे झुमके रक़ीब हैं मेरे
Upendra Bajpai
मिरा रक़ीब भी उस शहर में है वो हैं जहाँ
मैं जो भी सोच रहा हूँ वो हो रहा है कहीं
Faiz Ahmad
रखे हुए हैं मेरे होंठ उस की आँखों पर
रक़ीब देख के उस का ये तिलमिलाया है
Shajar Abbas
ऐन-मुमकिन है मुझे वो छोड़ जाए
ग़ैर-मुमकिन है मुझे वो भूल पाए
Avtar Singh Jasser
देख मिल ही गया रक़ीब मुझे
अब मुक़म्मल हुआ है इश्क़ मेरा
A R Sahil "Aleeg"
बे-वफ़ा से क्या वफ़ा करे कोई
दिल लगा के जब दग़ा करे कोई

नर्क से हरगिज़ नहीं हसद होगा
दोस्त ही जब डसा करे कोई
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Shubham Rai 'shubh'
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थी कुछ से प्रीति था कुछ से हमारा बैर
कभी अपना कभी अपना बना था ग़ैर

कठिन हर रास्ता मंज़िल दिखाएगा
मिलेगी क़ामयाबी तुम चलाओ पैर
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"Dharam" Barot
दिल की दुनिया अजीब लगने लगी
अब तो ये बद'नसीब लगने लगी

ज़िंदगी यूँँ ख़फ़ा नहीं थी कभी
जाने कैसे रक़ीब लगने लगी
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Hameed Sarwar Bahraichi
खु़दास रिश्ता क़रीब से है
‌ख़फ़ा ये दिल तो नसीब से है

समझ रहे थे जिसे मोहब्बत
उसे मोहब्बत रक़ीब से है
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Shailendra gupta
ख़्वाहिश-ए-ग़ैर क्या भला हम को
तेरी ख़्वाहिश भी अब नहीं बाक़ी
Meem Maroof Ashraf
कब और कहाँ खिलाए हैं गुल तुम ने क्या कहें
सब जानते है हम सो फ़साना ये क्या कहें

की बे-वफ़ाई और बनी दुल्हन रक़ीब की
बदनाम इश्क़ में हुए हम कितने क्या कहें
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A R Sahil "Aleeg"
मेरे रक़ीब तू उस रोज़ मुझ सेे जीतेगा
तुझे वो जब ये बता दे कि एक लड़का था

फिर उस के बा'द उसे मेरा सच बता देना
अगर वो कहने लगे दिल का नेक लड़का था
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Mohit Dixit
रक़ीब कर लिया ख़ुश हो के दुश्मन-ए-जाँ को
यूँँ इंतिक़ाम-ए-मोहब्ब्त लिया गया हम सेे

हमारे दिल पे क़यामत गुज़र गई मुर्शिद
हमारा चाहने वाला जुदा हुआ हम सेे
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Shajar Abbas
हसद तो फूलों को आया होगा
वो जब ज़रा मुसकुराया होगा
Mohsin Ahmad Khan
मिरी ग़ैर-मौजूदगी में सनम ने
किसी दूसरे का सहारा लिया है
Sohil Barelvi
लफ़्ज़ सब ग़ैर-मुस्तनद हैं तिरे
तेरी आँखों में प्यार दिखता है
Meem Maroof Ashraf
सीखना है अब मुझे रक़ीब से भी एक फ़न
कैसे पाते हैं नसीब में जो दूसरे का हो
100rav
पहले मुझ को हबीब कहता था
अब वो मुझ को अजीब कहता है

जो मुझे जान जान कहता था
अब वो मुझ को रक़ीब कहता है
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Sabir Pathan
तुम लौट आओ जिस सेे वो राह ढूँढ़ते थे
अब है नज़र ख़ुदा पे या बस रक़ीब पे है
Chetan
हिज्र-ए-मौसम में अपनी सी कर ली
तू ने हद पार सारी ही कर ली

दिल मिरा टूट ज़ोर से ही गया
बात जब उस ने ग़ैर की कर ली
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Parvez Shaikh
मानूँ गर ग़ैर भी कहे मुझ सेे
अपनों का क्या भरोसा अपने हैं
Chetan
मुझ सेे मिरे अहबाब हसद करने लगे हैं
मिल कर सभी दुश्मन की मदद करने लगे हैं

था इश्क़ की मैं जितनी रिवायात का रावी
वो सारी रिवायात ये रद करने लगे हैं
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Shajar Abbas
मुझे ही चाहता है मुद्दतों से वरना फिर
रक़ीब तक के तिरे हम मुकरने वाले थे

ये उस का घर है यहीं पे कहीं पे यारों सो
नहीं तो शहर से कब के निकलने वाले थे
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Manish Yadav
बद-गुमानी, अना, हसद 'असलम'
ख़ाक रिश्तों पे डार जाते हैं
Javed Aslam
ग़ैर के अश'आर पढ़कर देखिए अब
ख़ुद को ग़ालिब मीर समझा जा रहा है
Kumar Aryan
जब हसद फैला है तो रहमत नहीं
घर के अंदर आज वो जन्नत नहीं

इस क़दर बीमार हम भी हो गए
रात में सोने की भी फ़ुर्सत नहीं
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Meem Alif Shaz
ख़ाक बस्तियों में घर रेत के बनाओगे
रोज़ रोज़ ऐसे ही ख़ूब चोट खाओगे

सोचते तो हैं हम भी छत से कूद जाएँ अब
फिर ख़याल आता है तुम कहाँ पे जाओगे

जो हमारे हो कर भी हर किसी को देखोगे
बे-वफ़ा की गिनती में यार आ ही जाओगे

बे-नक़ाब होकर के हम निकल तो आएँगे
हो गया कहीं कुछ भी हमपे टिन-टिनाओगे

शब के आठ बजते ही तुम कहाँ पे जाते हो
कोई पूछ बैठा फिर बोलो क्या बताओगे

जब रक़ीब बनकर ही कुछ नहीं हुआ तुम सेे
तुम हबीब बनकर क्या बस्तियाँ जलाओगे

जब नज़र झुकाओगे बात बन ही जाएगी
प्यार से जो बोलेंगे तुम भी मान जाओगे
इश्क़ का मुहब्बत का जब बुख़ार आएगा
वक़्त पर दवा लेना ख़ुद ही भूल जाओगे

जब कभी भी तन्हाई नोच कर के खाएगी
मेरा नाम लिख कर तुम हाथ पर मिटाओगे

दास्ताँ मोहब्बत की एक बार सुन लोगे
मेरा नाम गीतों में तुम भी गुन-गुनाओगे
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Prashant Kumar
वो दोस्ती निभाएगा इस दुश्मनी के बा'द
अपने रक़ीब पर कभी कर के यक़ीन देख
Lalit Pandey
यक़ीन ये है वो इक रोज़ लौट आएगा
सितम ये है वो अभी ग़ैर के असर में है
Satyavan Satya
शौक़ है अभी तुझे ग़ैर से निभाने का
फिर भी अपनी हम वफ़ा तेरे नाम करते हैं
Rohan Hamirpuriya
तकलीफ़ है कि तुम ने भी बेवफ़ाई की
मक्कार ग़ैर किस को अजीब लगता है
Karal 'Maahi'
याद आता है रक़ीब से रोज़ उस का झगड़ा करना
और फिर मुझ सेे आ के उस की रोज़ शिक़ायत करनी
Naaz ishq
रटूँ दिन रात जो तू वो कथन है
कभी भूलूं नहीं ऐसा बदन है

वो टेडी जो लगा रहता है तुम सेे
मुझे उस सेे बहुत ज़्यादा जलन है
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Harsh Raj
उदासी जिस तरह देखी बदन में है उसे कहना
कहीं मर ही न जाए हम घुटन में है उसे कहना

हमारे लोग जो घर तक बचा पाए नहीं अपना
गए मिट आग की ऐसी जलन में है उसे कहना
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Shivam Raahi Badayuni
एक भीतर जलन बढ़ी दिल में
आँख में इंतिज़ार तू ही है
Vinod Ganeshpure
रब्त उस सेे बढ़ा कर के इतरा रहे हैं रक़ीब
उस के पहलू में तो मैं ने अर्सा बिता रक्खा है
Rohan Hamirpuriya
तुझ को नहीं पता तो बता दूँ कि ऐ रक़ीब
शाहों का शाह हूँ मैं क़लन्दर हूँ जान ले

वो आग है कि तू उसे छूने से ख़ौफ़ खा
बाक़ी रही मेरी तो मैं 'सागर' हूँ जान ले
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Sagar Kaushik
थोड़े-मोड़े थोड़ी हम तो बेहद अजीब थे
रस्ते तब बदले जब हम मंज़िल के क़रीब थे

किस पर मढ़ते दोष अपनी बर्बादी का 'आतिश'
दूजा कोई न था हम ख़ुद ही अपने रक़ीब थे
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Aatish Indori
रक़ीब से हूँ बहुत परेशाँ
गले लगा है अज़ाब जैसे
Arman Habib
इस दिल-ओ-दिल में जब बसा है तू
बात कैसे रक़ीब ही होगी
Manohar Shimpi
तुम तो क़रीब लगते हो
मतलब रक़ीब लगते हो
Nit
उन के क़रीब लगते हो
मतलब रक़ीब लगते हो
Nit
अगर यतीम-ओ-ग़रीब की तुम मदद करोगे जज़ा मिलेगी
सुकून-ए-क़ल्ब-ए-हज़ी मिलेगा ख़ुदा नबी की रज़ा मिलेगी

कभी भी अपने दिलों के अंदर किसी से बुग़्ज़-ओ-हसद न रखना
निज़ाम-ए-रब-उल-क़दीर है ये ख़ता करोगे सज़ा मिलेगी
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Shajar Abbas
वो वफ़ा के नाम पर हुस्न भुना रहे हैं अब यूँँ
कि मुरीद बन गए हैं कई सौ रक़ीब उन के
arjun chamoli
वो जो उन के क़रीब होते हैं
या'नी मेरे रक़ीब होते हैं
Nit
ग़ैर-वाजिब है कि ग़ैरों की ज़बाँ है उर्दू
हिन्द के तर्ज़-ओ-तमद्दुन का निशाँ है उर्दू

जिस को ख़ुद अपनी ही औलाद ने पागल है किया
रंज में डूबी हुई ऐसी ही माँ है उर्दू
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divya 'sabaa'
वो रात ख़्वाब में किया था प्यार इस तरह
दिखा रक़ीब आज पर बुरा नहीं लगा
arjun chamoli
काँटों से दोस्त बन के गुज़ारिश न कीजिए
ये बस रक़ीब होते हैं चुभ जाते हैं कभी
arjun chamoli
टूटा है कौन कितना ये आँकलन कहाँ है
कोई दीए के दिल से पूछे जलन कहाँ है
Mukund Sharma
निभाओगी जो तुम वा'दा करोगी
वफ़ा का या कहीं सौदा करोगी

जिसे तुम ढूँढती रहती हो मुझ में
मिला वो ग़ैर में तो क्या करोगी
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Shan Sharma
हमें मोहब्बत है आप ही से यक़ीं वो हम को दिला रही है
है मिलके आई रक़ीब से और वफा की क़स
में उठा रही है

बताएँ हम अब ये किस को कैसे वो कैसे किस को चला रही है
इसे भी लव यूँ उसे भी लव यूँ वो सब का उल्लू बना रही है
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Najmu Ansari Nazim
बारहा उस की गली और वो दर दिखता था
पर जिसे देखना था एक नज़र दिखता था

क्या करूँ अब कि खड़ी कर गया दीवार रक़ीब
वरना घर से मेरे महबूब का घर दिखता था
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Bhuwan Singh
रिश्ता चला रक़ीब से दौलत के वास्ते
दौलत नहीं सुकून मिरी जान ज़िंदगी
Neeraj Yadav 'Neer'
हुस्न की इक परी है जान मेरी
सो रक़ीब आसमान है मेरा
Prit