Powerful Protest Shayari - Awaaz uthao through poetry against injustice and oppression

Protest shayari is the voice of resistance, where words become a powerful medium to challenge injustice and express dissent. It reflects emotions like anger, courage, and the hunger for insaaf. Whether about society, politics, or personal freedom, this poetry inspires people to stand up and speak out.

मेरी ख़ामोशियों में लर्ज़ां है
मेरे नालों की गुम-शुदा आवाज़
Faiz Ahmad Faiz
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बिछड़ कर उस का दिल लग भी गया तो क्या लगेगा
वो थक जाएगा और मेरे गले से आ लगेगा

मैं मुश्किल में तुम्हारे काम आऊँ या ना आऊँ
मुझे आवाज़ दे लेना तुम्हें अच्छा लगेगा
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Tehzeeb Hafi
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मुंसिफ़ हो अगर तुम तो कब इंसाफ़ करोगे
मुजरिम हैं अगर हम तो सज़ा क्यूँँ नहीं देते
Ahmad Faraz
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हम अम्न चाहते हैं मगर ज़ुल्म के ख़िलाफ़
गर जंग लाज़मी है तो फिर जंग ही सही
Sahir Ludhianvi
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रोक सकता हमें ज़िंदान-ए-बला क्या 'मजरूह'
हम तो आवाज़ हैं दीवार से छन जाते हैं
Majrooh Sultanpuri
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सर पर हवा-ए-ज़ुल्म चले सौ जतन के साथ
अपनी कुलाह कज है उसी बाँकपन के साथ
Majrooh Sultanpuri
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इस शहर में जीने के अंदाज़ निराले हैं
होंटों पे लतीफ़े हैं आवाज़ में छाले हैं
Javed Akhtar
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ये भी ए'जाज़ मुझे इश्क़ ने बख़्शा था कभी
उस की आवाज़ से मैं दीप जला सकता था
Ahmad Khayal
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ज़ुल्म फिर ज़ुल्म है बढ़ता है तो मिट जाता है
ख़ून फिर ख़ून है टपकेगा तो जम जाएगा
Sahir Ludhianvi
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मिरी ख़ामोशियों की झील में फिर
किसी आवाज़ का पत्थर गिरा है
Aadil Raza Mansoori
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मुझे रोना नहीं आवाज़ भी भारी नहीं करनी
मोहब्बत की कहानी में अदाकारी नहीं करनी
Afzal Khan
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जाने क्या क्या ज़ुल्म परिंदे देख के आते हैं
शाम ढले पेड़ों पर मर्सिया-ख़्वानी होती है
Afzal Khan
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अपना हर तिनका समेटे किस जगह पर जा छुपे
हम तिरी आवाज़ की चिड़ियों से घबराते हुए
Swapnil Tiwari
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आवाज़ दे के देख लो शायद वो मिल ही जाए
वर्ना ये उम्र भर का सफ़र राएगाँ तो है
Muneer Niyazi
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ज़ालिम था वो और ज़ुल्म की आदत भी बहुत थी
मजबूर थे हम उस से मोहब्बत भी बहुत थी
Kaleem Aajiz
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तेरा लिक्खा जो पढ़ूँ तो तेरी आवाज़ सुनूँ
तेरी आवाज़ सुनूँ तो तेरा चेहरा देखूँ
Bhaskar Shukla
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शब भर इक आवाज़ बनाई सुब्ह हुई तो चीख़ पड़े
रोज़ का इक मामूल है अब तो ख़्वाब-ज़दा हम लोगों का
Abhishek shukla
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टक गोर-ए-ग़रीबाँ की कर सैर कि दुनिया में
उन ज़ुल्म-रसीदों पर क्या क्या न हुआ होगा
Meer Taqi Meer
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मोहब्बत कर मोहब्बत कर यही बस कह रहा है दिल
सुन अपने दिल की तू ये ग़ैर की आवाज़ थोड़ी है
Krishnakant Kabk
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तेरी आवाज़ को इस शहर की लहरें तरसती हैं
ग़लत नंबर मिलाता हूँ तो पहरों बात होती है
Ghulam Mohammad Qasir
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जाने क्या क्या ज़ुल्म परिंदे देख के आते हैं
शाम ढले पेड़ों पर मर्सिया-ख़्वानी होती है
Afzal Khan
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लहजा कि जैसे सुब्ह की ख़ुश्बू अज़ान दे
जी चाहता है मैं तिरी आवाज़ चूम लूँ
Bashir Badr
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बाज़ार जा के ख़ुद का कभी दाम पूछना
तुम जैसे हर दुकान में सामान हैं बहुत

आवाज़ बर्तनों की घर में दबी रहे
बाहर जो सुनने वाले हैं, शैतान हैं बहुत
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Aalok Shrivastav
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यूँँ ही हमेशा उलझती रही है ज़ुल्म से ख़ल्क़
न उन की रस्म नई है, न अपनी रीत नई

यूँँ ही हमेशा खिलाए हैं हम ने आग में फूल
न उन की हार नई है, न अपनी जीत नई
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Faiz Ahmad Faiz
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इस गए साल बड़े ज़ुल्म हुए हैं मुझ पर
ऐ नए साल मसीहा की तरह मिल मुझ से
Sarfraz Nawaz
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ख़ामोशी में आवाज़ का किरदार कोई है
जो बोलता रहता है लगातार, कोई है
Shakeel Gwaliari
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अब उस के दर से भी आवाज़ आती है कि नहीं
बता रे ज़िन्दगी तू बाज़ आती है कि नहीं

बहकने लगता है जब जब किसी के प्यार में दिल
तो तेरी याद यूँंँ आके डराती है कि नहीं
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Faiz Ahmad
ज़माना ज़ुल्म करता है ख़ुशी से
कभी तुझ को कभी मुझ को सताए
Meem Alif Shaz
डाली है ख़ुद पे ज़ुल्म की यूँँ इक मिसाल और
उस के बग़ैर काट दिया एक साल और
Subhan Asad
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एक आवाज़ पे आ जाती है दौड़ी दौड़ी
दश्त-ओ-सहरा-ओ-बयाबान नहीं देखती है

दोस्ती दोस्ती होती है तुम्हें इल्म नहीं
दोस्ती फ़ाइदा नुक़सान नहीं देखती है
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Aadil Rasheed
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जब उस ने पलट कर नहीं देखा तो ये जाना
आवाज़ लगाने में भी नुक़सान बहुत है
Imtiyaz Khan
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तबक़ों में रंग-ओ-नस्ल के उलझा के रख दिया
ये ज़ुल्म आदमी ने किया आदमी के साथ
Bakhtiyar Ziya
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रगों में ज़हर-ए-ख़ामोशी उतरने से ज़रा पहले
बहुत तड़पी कोई आवाज़ मरने से ज़रा पहले
Khushbir Singh Shaad
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रंग दरकार थे हम को तिरी ख़ामोशी के
एक आवाज़ की तस्वीर बनानी थी हमें
Nazir Wahid
बहुत था ख़ौफ़ जिस का फिर वही क़िस्सा निकल आया
मिरे दुख से किसी आवाज़ का रिश्ता निकल आया
Bashar Nawaz
काठ की हाँडी अब न चढ़ेगी ज़ुल्म के चूल्हे पर यारो
वक़्त का पहिया घूमेगा मुंसिफ़ भी जेल में जाएगा
Amaan Pathan
ये ख़ामुशी का ज़हर नसों में उतर न जाए
आवाज़ की शिकस्त गवारा न कर अभी
Saqi Faruqi
कुछ न कहने से भी छिन जाता है एजाज़-ए-सुख़न
ज़ुल्म सहने से भी ज़ालिम की मदद होती है
Muzaffar Warsi
आवाज़ दे के छुप गई हर बार ज़िंदगी
हम ऐसे सादा-दिल थे कि हर बार आ गए
Ahmad Faraz
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सब्र पर दिल को तो आमादा किया है लेकिन
होश उड़ जाते हैं अब भी तेरी आवाज़ के साथ
Aasi Uldani
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ख़ामुशी कब चीख़ बन जाए किसे मालूम है
ज़ुल्म कर लो जब तलक ये बे-ज़बानी और है
Munawwar Rana
छुप गए वो साज़-ए-हस्ती छेड़ कर
अब तो बस आवाज़ ही आवाज़ है
Asrar Ul Haq Majaz
जब कभी नींद हमें वक़्त पे आने लगे है
तो डर के तेरी याद को आवाज़ लगा देते हैं
Parwez Akhtar
मेरी जाँ कोई ज़ुल्म न कर ख़ुदा के लिए
यहाँ कोई ग़ुरूर नहीं रहता सदा के लिए
Praveen Bhardwaj
हमारी वफ़ा का वो इंसाफ़ होगा
तिरी आँख से जब ये काजल छटेंगे
Aarush Sarkaar
यूँँ ज़ोर से ना दे दुहाई, ज़ुल्म सहता शख़्स तू
रूठे ख़ुदा ना और भी, तेरा ख़ुदा है सो रहा
Zain Aalamgir
सब याद रहता है मुझे
ये ज़ुल्म भी तारी यहाँ
Zain Aalamgir
कोई उठता नहीं मज़लूम का हामी बनकर
कब तलक ज़ुल्म पा ख़ामोश रहेगी दुनिया
''Akbar Rizvi"
तानाशाही पे हवाएँ भी उतर आई हैं अब
मैं ने आवाज़ उठाई तो बुझा डाला मुझे
Ramnath Shodharthi
बोलते रहना अगर बोलना आता है तुम्हें
बोलते रहने से आवाज़ बनी रहती है
Ramnath Shodharthi
देर तक कोई भी एहल-ए-ज़ुल्म यूँँ टिकता नहीं
चार सू फैली हुई है कर्बला की रौशनी
''Akbar Rizvi"
जो घर, गली, शहर, देश खोया ज़रूर लेंगे
नए रखो नाम हम पुराना ज़रूर लेंगे

सुनो कि तुम जितना सह सको उतना ज़ुल्म करना
ये याद रखना, के हम भी बदला ज़रूर लेंगे
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Abuzar kamaal
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जहाँ पे ख़त नहीं आवाज़ जाती हैं
हमारे पास वो दरबार रहने दो
Tiwari Jitendra
ख़ुदा से रू-बा-रू होना हैं रोज़-ए-महशर में
ये बात सोच लो तुम मुझ पा ज़ुल्म ढाते हुए
Shajar Abbas
ख़ुदा तेरे वजूद से इनकार नहीं है मुझ को
मगर सवाल तो तेरे इंसाफ-परस्त का है
A R Sahil "Aleeg"
रहेगा हमेशा ही ये धूप का साथ
है जब आरज़ू ही नहीं छाँव मुझ को

जहाँ बस हो रोने की आवाज़ और दुख
वहीं खींच ले जाता है पाँव मुझ को
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Sayeed Khan
हवाएँ चूम कर तुम ने
चिराग़ों को जलाया है

तेरी आवाज़ दस्तक है
ख़ुदा ने घर बुलाया है
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SIDDHARTH SHARMA
मुबारकबाद सारे दोस्तों को दे चुके हैं पर
तिरी आवाज़ सुन लें तो हमारा साल बन जाए
Akash Rajpoot
रहम, इंसाफ़ से ख़ाली जब हो ये दिल
फिर वो कुछ और ही है पर इंसाँ नहीं है
A R Sahil "Aleeg"
आँखें मूँदे रहे लब को सीते गए
पेट ख़ाली रहे ग़म को पीते गए

शर्म करते हैं अब ख़ुद की हस्ती पे हम
ज़ुल्म सहते रहे और जीते गए
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Amaan Javed
मिरी आवाज़ तुम को रोक सकती थी
मुझे इस बात का ग़म है, मुसलसल है
Ajay Singh
धड़कता है हमारा दिल यहाँ पे अब
मकाँ के गेट पे आवाज़ पाने पर
Raunak Karn
अगर जहाँ में मोहब्बत पे ज़ुल्म होता है
लहद में क़ैस की मय्यत बहुत तड़पती है
Shajar Abbas
करेंगे ज़ुल्म उन पर और उन्हें हम भूल जाएँगे
हमें ये बात भी उन को इशारों में बतानी है
Faizan Faizi
ये तेरा हुस्न उफ़ पल पल मुझे घाइल ही करता है
तेरे ही इश्क़ का बस है करम जो मैं कि ज़िंदा हूँ

मुझे आवाज़ दे दे तो मैं आख़िर क्यूँ न आऊँगा
अरे मैं तो तेरा पाला हुआ आशिक़ परिंदा हूँ
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Adnan Ali SHAGAF
वो भी क्या दिन थे जब घंटों तक बातें हुआ करती थी
आवाज़ तिरी सुनने को कान मिरे अब तरस गए हैं
Sandeep dabral 'sendy'
छपने वाले हैं कार्ड फलाँ दिन मेरी शादी 'सैंडी'
सुन बदल गई आवाज़ मेरी खिल-खिल से धीरे धीरे
Sandeep dabral 'sendy'
अपनी हिम्मत का अब चराग़ जलाना होगा
जु़ल्म की आँख में अब आँख दिखाना होगा

जिस तरफ़ देखो है पामाल हुआ हक़ सबका
उठो अब ख़ुद का ही हक़ छीन के पाना होगा
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Ishq Allahabadi
जला यहाँ चराग़ तो दिखा ये कौन लोग हैं
ख़मोश ज़ुल्म पर हैं सब यहाँ ये मौन लोग हैं
Kajiimran
लाखों अरमाँ लौट आए हैं तेरे कॉल के आने पे
जाने वाले लौट आते हैं ज्यूँँंँ आवाज़ लगाने पे
Aditya
अदालत का ये चेहरा तो नहीं था
यहाँ पे ज़ुल्म गहरा तो नहीं था

सभी को थी मोहब्बत मज़हबों से
किसी मज़हब को ढाया तो नहीं था
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Meem Alif Shaz
करना जो था कर गया हूँ
आख़िरी हद पर गया हूँ

जब्र होता मुझ पर इतना
ज़ुल्म जितना कर गया हूँ
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Sayeed Khan
पहली सफ़ में जो खड़े हैं क़त्ल का इंसाफ लेने
गर जो मुर्दा बोलता होता तो फिर सफ़ साफ होती
Aqib khan
ग़लत आदत है आँखों की बड़ा ये ज़ुल्म करती हैं
जिन्हें मैं पा नहीं सकता उन्हें फिर देखना ही क्यूँ
Ankesh Arjun
उम्मत ने ज़ुल्म ढाया ये आल-ए-रसूल पर
साया तलक ना छोड़ा मज़ार-ए-बतूल पर

चारों तरफ़ है फैली मदीने में रौशनी
पर तीरगी है आज भी क़ब्र-ए-बतूल पर
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Shajar Abbas
तुम आवाज़ हो मेरी इक संसार हो मेरा
मैं भटका परिंदा हूँ तुम हंजार हो मेरा
Muhammad Asif Ali
आवाज़ दी गई हमें तो ये कहा गया
ओऐ, इधर आ जा इधर, इक शे'र लिखना है
"Nadeem khan' Kaavish"
कल भी आया था मैं खिड़की पे थे पंछी बैठे
तुम को आवाज़ लगाता तो वो उड़ जाने थे
Mohit Dixit
तोड़ कर दिल मिरा दिखाया है
प्यार में तू ने ज़ुल्म ढ़ाया है
Danish Balliavi
वालिद तिरा है ज़ुल्म हम पर कर रहा
यूँँ भेजकर बाज़ार बुर्के में तुझे
Kuldeep Tripathi KD
देख कर ज़ुल्म-ओ-सितम मज़लूम पर
आज फिर इंसानियत शर्मा गई
Shajar Abbas
सफ़र आसान था चलता रहा राही
चले जाओ कि दिल आवाज़ देता है
Sabir Pathan
इमदाद करने दश्त-ए-जुनूँ से मैं आऊँगा
क़ुव्वत के साथ आशिक़ों आवाज़ दो मुझे
Shajar Abbas
रेल में बैठ कर जब कहीं तुम चले
पटरियों सा मैं आवाज़ देता रहा
Prashant Paras
हज़रत-ए-दिल पे इतने ज़ुल्म-ओ-सितम
हुस्न-दाँ मत करो ख़ुदा के लिए
Shajar Abbas
लानत हो हुकूमत पे सदा हाकिम-ए-क़लमी
इंसाफ़ से महरूम हैं मज़लूम वतन के
Shajar Abbas
जब से मैं बिछड़ा हूँ तुम से तब से बस ये चाह है
फिर कोई माज़ी की राहों से मुझे आवाज़ दे
Talha Lakhnavi
ज़रूरत ही नहीं अब हम को मुंसिफ की
कि अब क़ातिल ही ख़ुद इंसाफ़ करता है
Meem Alif Shaz
शब-ए-हिज्राँ में सुनता था, सलीब-ए-वक़्त की सिसकी
ये कुछ पागल समझते हैं घड़ी आवाज़ करती है
"Nadeem khan' Kaavish"
ज़ुल्म इक ख़ुद पे किए मैं जा रहा हूँ
यूँँ-ही बे-मक़्सद जिए मैं जा रहा हूँ

बन गई हैं ज़िंदगी इक ज़हर मेरी
और उस को भी पिए मैं जा रहा हूँ
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Kabiir
फिर नया ख़्वाब बुन रही हो ना
राह दुश्वार चुन रही हो ना

मैं यहाँ तुम से ही मुख़ातिब हूँ
मेरी आवाज़ सुन रही हो ना
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Wajid Husain Sahil
इश्क़ का है ज़कात और सदका
ज़ुल्म हँस के सहो सनम के तुम
A R Sahil "Aleeg"
ज़ुल्म जो करते हैं ये ज़ेहन में रख लें अपने
वक़्त ये अपने को हर-हाल में दोहराता है
NEERAJ SAINI
ज़ालिमों को आसमाँ भी चाहिए
ये ज़मीं तो भर गई है ज़ुल्म से
Meem Alif Shaz
मोहब्बत ज़ुल्म करती है खिलौनों पर
कि बच्चे इश्क़ में बर्बाद बैठे हैं
Kuldeep Tripathi KD
हम सेे जो दूर रहा करते हैं उन को अक्सर
दिल की आवाज़ सुनाने को ग़ज़ल कहते है
Talha Lakhnavi
ख़ुदा जाने वो ऐसे कैसे क्यूँ ये मर्द पाले हैं
सियासी लोग अपने दल में दहशतगर्द पाले हैं

किया करते हैं जो ज़ुल्म-ओ-सितम हर बेबसों पर यूँँ
वो अपने आस्तीनों में फ़क़त बे-दर्द पाले हैं
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Danish Balliavi
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मैं तो अब इस लिए चुप रहता हूँ हर वो जगह में भी
मिरे आवाज़ में तो शोर-आवर कुछ ज़ियादा है
Kanz Al Rida
अभी आवाज़ दोगे आप तो फिर लौट आऊँगा
नहीं तो दश्त फैला है बहुत खोने भटकने को
Kavi Nitin Mishra Nishchal
सभी को है ख़बर याँ उन की फ़ितरत है दग़ा करना
बहुत आसान है आशिक़ को इस दिल से जुदा करना

दग़ाबाज़ों की महफ़िल से ये इक आवाज़ आई है
बहुत दुश्वार है 'दानिश' मुहब्बत में वफ़ा करना
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Danish Balliavi
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वक़्त आशंकित हुआ ये देख कर
ख़त्म हो जाए न स्वर विद्रोह का
Umesh Maurya
वो मुझ को जब नज़रअंदाज़ करती है
ये ख़ामोशी बहुत आवाज़ करती है
Yamir Ahsan
आवाज़ इक अपने रविश पर आ गया
सरकार को भी यार चक्कर आ गया

बिकने लगी ईमानदारी शख़्स की
हिस्से मिरे आँसू तिरे ज़र आ गया
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Shubham Rai 'shubh'
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कोई आवाज़ देता है कहीं से
मगर दिखता नहीं है कौन है वो
Dinesh Sen Shubh
गरीबों को सताया जा रहा है
उन्हीं पर ज़ुल्म ढ़ाया जा रहा है

गरीबों के सभी क़ातिल को 'दानिश'
न जाने क्यूँ बचाया जा रहा है
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Danish Balliavi
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ज़ुल्म करते हैं हम पे लोग अभी
इतना क्यूँ जलते हम से लोग अभी

हम ने तो हक़ किसी का खाया नहीं
तंज़ कैसे भी देते लोग अभी
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Parvez Shaikh
बुला लेना मुझे आवाज़ देना
परेशाँ हो तो मेरा नाम लेना
Shashank Tripathi
ज़ुल्म ऐसा न मेरे साथ करें
ज़िस्म में रूह भी न बाक़ी रहे
Parvez Shaikh