Mazhab Shayari - Faith, insaaniyat, and beliefs expressed through thoughtful poetry

Mazhab shayari reflects the deep connection between faith, belief, and humanity. It often explores dharma, iman, and insaaniyat beyond boundaries, expressing thoughts about unity, spirituality, and inner truth. These verses beautifully capture how religion shapes emotions, identity, and perspective.

mazhab shayari
तेरा चुप रहना मेरे ज़ेहन में क्या बैठ गया
इतनी आवाज़ें तुझे दीं कि गला बैठ गया
Tehzeeb Hafi
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deen shayari
मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा
Allama Iqbal
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जब बुलंदी का गुमाँ था तो नहीं याद आई
अपनी परवाज़ से टूटे तो ज़मीं याद आई

वही आँखें कि जो ईमान-शिकन आँखें हैं
उन्हीं आँखों की हमें दावत-ए-दीं याद आई
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Subhan Asad
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मज़हब से मेरे क्या तुझे मेरा दयार और
मैं और यार और मिरा कारोबार और
Meer Taqi Meer
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मुझ से कहा जिब्रील-ए-जुनूँ ने ये भी वही-ए-इलाही है
मज़हब तो बस मज़हब-ए-दिल है बाक़ी सब गुमराही है
Majrooh Sultanpuri
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अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए
जिस में इंसान को इंसान बनाया जाए
Gopaldas Neeraj
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'मीर' के दीन-ओ-मज़हब को अब पूछते क्या हो उन ने तो
क़श्क़ा खींचा दैर में बैठा कब का तर्क इस्लाम किया
Meer Taqi Meer
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तुम्हें ये किस ने कहा रब को नहीं मानता मैं
ये और बात कि मज़हब को नहीं मानता मैं
Bhaskar Shukla
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जो दिल रखते हैं सीने में वो काफ़िर हो नहीं सकते
मोहब्बत दीन होती है वफ़ा ईमान होती है
Arzoo Lakhnavi
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चलता रहने दो मियाँ सिलसिला दिलदारी का
आशिक़ी दीन नहीं है कि मुकम्मल हो जाए
Abbas Tabish
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मैं ने कल शब चाहतों की सब किताबें फाड़ दीं
सिर्फ़ इक काग़ज़ पे लिक्खा लफ़्ज़-ए-माँ रहने दिया
Munawwar Rana
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तपते सहराओं में सब के सर पे आँचल हो गया
उस ने ज़ुल्फ़ें खोल दीं और मसअला हल हो गया
Tehzeeb Hafi
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रंग और नस्ल ज़ात और मज़हब जो भी है आदमी से कमतर है
इस हक़ीक़त को तुम भी मेरी तरह मान जाओ तो कोई बात बने
Sahir Ludhianvi
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क़ौम-ओ-मज़हब क्या किसी का और क्या है रंग-ओ-नस्ल
ऐसी बातें छोड़ कर बस इल्म-ओ-फ़न की बात हो
Sayan quraishi
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यही है इबादत यही दीन-ओ-ईमाँ
कि काम आए दुनिया में इंसाँ के इंसाँ
Altaf Hussain Hali
मैं एक पुल हूँ मुझे दीन-धर्म क्या मालूम
मेरा तो काम है लोगों को जोड़ कर रखना
Saarthi Baidyanath
रहेगा जब तलक मज़हब जहाँ में
नहीं मिल पाएगा वो रब जहाँ में

जहॉं सारा मुझे दिखता था जिस
में
वही दिखता नहीं है अब जहाँ में
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Rituraj kumar
मोहब्बत है अगर आकाश जैसा
तो मज़हब एक सुपली की तरह है
Saarthi Baidyanath
गली हर इक मोहब्बत की अँधेरी हो नहीं सकती
सिवा मज़हब के मजबूरी तो तेरी हो नहीं सकती

किया था इश्क़ मैं ने जब तभी ये जानता था मैं
तू लड़की है 'अलीगढ़' की तू मेरी हो नहीं सकती
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Shashank Shekhar Pathak
सर पे मज़्हब चढ़ा हुआ है अब
दिल में मज़्हब न ढूंढिये साहिब
Saarthi Baidyanath
कुछ तो पढ़ने के लिए और कुछ पढ़ाने के लिए
इस तरह से वक़्त ने सारी किताबें बाँट दीं
Saarthi Baidyanath
फ़क़त ये सोच कर मुँह को कलेजा आ रहा है
हमारे इश्क़ को मज़हब का कीड़ा खा रहा है
Shajar Abbas
कराओ अब मिरी घर वापसी भी ओ जहाँ वालों
ये मेरा इश्क़ मज़हब था मिरा वो छोड़ आया हूँ
anupam shah
तुम अपना दीन दिखाओ उसे, मोहब्बत भी
गले लगाओ मगर पहले तुम सलाम करो
Mohammad Aquib Khan
इश्क़ इकलौती वो मज़हब है जिस के उम्मती यहाँ
बे-वफ़ा की भी इबादत करते है ता-दम-ए-पसीं
A R Sahil "Aleeg"
अगर मुलातफ़त का नाम दीन है
बशर ख़ुदा से ना डरे ख़ुदा करे
Kaif Uddin Khan
उस सेे हम ने आख़िर कर दीं
दिल की बातें ज़ाहिर कर दीं
Kaviraj " Madhukar"
दो ही मज़हब हैं दुनिया-ए-फ़ानी में बस
मज़हब-ए-रूह या मज़हब-ए-नफ़्स है
A R Sahil "Aleeg"
मिटा दीं फ़ोन से सब यादें उस की
बस अब दिल से भुलाना रह गया है
Shajar Abbas
एक मज़हब, मज़हब-ए-मौक़ा-परस्ती को भी होना था
लोग सब के सब, यहाँ मौक़ा-परस्ताना ही रहते हैं
A R Sahil "Aleeg"
सौंप दीं हम ने जिसे सब दौलतें
वो ही निकला है लुटेरा क्या करें
Vijay Anand Mahir
उस ने धुएं के साथ में यादें उड़ा दीं, भूल कर
सिगरेट की कश में मैं भी तो जल ही रही थी साथ में
Kanchan
ख़ुदा होता तो ये मज़हब नहीं होते
ख़ुदा होता तो मैं काफ़िर नहीं होता
Kinshu Sinha
हम गले मिलने ही वाले थे मगर
आ गया मज़हब हमारे बीच में
Umesh Maurya
लोग मज़हब के लिए लड़कर बहाते हैं लहू
मुल्क की ख़ातिर लहू लेकिन बहा सकते नहीं
Vivek Vistar
मज़हब-ए-इस्लाम को कर तर्क अपनाओ फ़क़त तुम दीन-हक़ को
फिर दिखाएगा ख़ुदा उस जंग-ए-ख़न्दक़ के ही जैसा मोजिज़ा भी
A R Sahil "Aleeg"
आशिक़-ए दीन-ए-ग़ज़ल के लिए कु़रआँ है वो
अब जिसे मीर का दीवान कहा जाता है
Mohammad Aquib Khan
वो तन अजमेर की चौखट, वो दिल वाराणसी का दर
मेरा माही मेरा मज़हब है, उस का दिल है मेरा घर
Prit
मज़हब पर लड़ने वालों होश में आ जाओ वरना
छोटा-मोटा झगड़ा इक दिन सरहद में बदलेगा
Sandeep dabral 'sendy'
अदालत का ये चेहरा तो नहीं था
यहाँ पे ज़ुल्म गहरा तो नहीं था

सभी को थी मोहब्बत मज़हबों से
किसी मज़हब को ढाया तो नहीं था
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Meem Alif Shaz
फिर गई है वो मेरे मज़हब से
आज से वो हराम है मुझ पर
Tauqeer jarwali
तमाम ख़ुशियाँ वो औरों में बाँट बैठा था
सो मेरे हिस्से में उस ने उदासियाँ रख दीं
Amaan Haider
एक काफ़िर से मोहब्बत जो की मैं ने
मुफ़्ती-ए-दीं ने मुझे दीं से निकाला
ALI ZUHRI
तेरा ख़ुदा मेरा रब आया
आख़िर बीच में मज़हब आया
Ambar
अक़्ल ने सैकड़ों दलीलें दीं
दिल ने हरगिज़ न बात इक मानी
Shadan Ahsan Marehrvi
मज़हब कि बातें लोग करते हैं मगर हाजत में फिर
दरकार करते हैं कि किस का भी लहू हो बस मिले
100rav
रख के सर सज्दे में अपना ये कहा सरवर ने
दीन-ए-इस्लाम को इस तरह बक़ा दी जाए

क़ासिम-ओ-औन-ओ-मोहम्मद अली अकबर असग़र
बाज़ू अब्बास के ज़ैनब की रिदा दी जाए
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Shajar Abbas
पढ़ा मत पाठ मज़हब के हिफाज़त की
पढ़ी है पाठ हम ने भी सियासत की

करूँँगा केस उस ज़ालिम हुकूमत पे
दिलाऊँगा सज़ा उस को मोहब्बत की
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Irshad Siddique "Shibu"
सभी मिलते हैं इक दूजे से मज़हब की बिना पर ही
कोई इंसाँ को इंसाँ ही समझ कर क्यूँ नहीं मिलता
A R Sahil "Aleeg"
भूखे को तू जल पान कराया कर
मज़हब से ऊपर भी उठ जाया कर

मैं मन्दिर जाता हूँ तेरे ख़ातिर
तू भी मस्जिद में नीर चढ़ाया कर
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Vijay Potter Singhadiya
हमीं बे-दीन हैं यारों वगरना
बड़े ही नेक हैं साथी हमारे
Kaif saifi
सब के सब फ़क़त हम इंसान बन के आए थे
फिर हुआ ये मिल कर मज़हब बना दिए हम ने
Kamlesh Goyal
इश्क़ मज़हब रब सनम और आशिक़ी इस की 'इबादत
इस में शिकवा कुफ़्र है और इल्तिज़ा जुर्म-ए-कबीरा
A R Sahil "Aleeg"
ख़ुदा के सामने सर अपना हम झुका देंगे
हम अपने दीन की ख़ातिर ये जाँ गँवा देंगे

तमाम उम्र इबादत करेंगे रब की हम
जो शान है मेरे रब की वो सब दिखा देंगे
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Danish Balliavi
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मज़हब-परस्ती और है इश्क़-ओ- मोहब्बत और है
तेरी इबादत और है मेरी इबादत और है
Saarthi Baidyanath
इस्लाम की हयात पे अहसान हैं हुसैन
या'नी ख़ुदा के दीन की पहचान हैं हुसैन

होगा सवाल क़ब्र में दीन-ए-हनीफ़ का
कह दूँगा दीन है, मेरा ईमान हैं हुसैन
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Faizan Sheikh Qais
ईंट का उत्तर अगर पत्थर है तो हैवानियत है
जो ख़ुदा को देख पाया सब में तो रूहानियत है

धर्म इक ख़ुशबू है जिस सेे है महकता ये जहाँ है
जान ले इंसाँ अगर ईमान तो इंसानियत है
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Manish Pithaya
इस वतन में छोटी सी बुलबुल के हूँ मानिंद मैं
मेरा मज़हब कुछ भी हो पर हूँ तो सारा हिंद मैं
Firdous khan
धर्मो मज़हब के कुछ हुड़दंगी नारों से
डर लगता है अब पर्वों से त्योहारों से
Irshad Siddique "Shibu"
दहशत-गर्दी फैल रही है अब मज़हब के नारों से
लोगों को मारा जाता है गोली से हथियारों से

कौन है रहबर कौन है रहज़न सब को ख़बर है 'दानिश' अब
क़ातिल को ताक़त मिलती है सत्ता के गलियारों से
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Danish Balliavi
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ज़िंदा रखने को ख़्वाहिशें उन की
दफ़्न सब अपनी हसरतें कर दीं
Wasif Quazi
ख़ुशबू-ए-इश्क़ से तुम भी तो नहाएे थे यार
जब हमें हुस्न के गुलशन में पनाहें दीं थीं
Nityanand Vajpayee
तितली घूम रही थी प्यासी सो हम ने
उस की प्यारी बातें फूलों पर रख दीं
Prakamyan Gautam
जुगनू बैठेंगे मेरी आँखों पर उस दिन
जिस भी दिन उस की यादें पलकों पर रख दीं
Prakamyan Gautam
हाँ 'इज़्ज़त-आबरू की तेरे शामत आने वाली है
किए पर दीन की तेरे बग़ावत आने वाली है
Jagat Singh
आज भी रौशन है जिस के दम से ये दीन-ए-ख़ुदा
मकतब-ए-इस्लाम में बस वो दिया ज़ैनब का है
Almas Rizvi
है मोहब्बत अब मज़हब अपना
सोच से भी हम सूफ़ी ठहरे
Saurabh
बात जब हक़ की हो इक शख़्स नहीं आता है
बात मज़हब की हो तो भीड़ निकल आती है
Mohit Subran
बँटे मुल्क मज़हब के ही वास्ते
बहा ख़ूँ सभी का जो मर कट गया
Saurabh Yadav Kaalikhh
लड़े लोग मज़हब बचाने को जब
इधर कोई भागा उधर कट गया
Saurabh Yadav Kaalikhh
साथ मज़लूम के हैं दीन के हामी हम हैं
मुख़्तसर ये है फ़िलिस्तीन के हामी हम हैं
Amaan Haider
है दीन तिरा अब क्या 'रौशन'
टोपी क़श्क़ा हाए हाए
Raushan miyaa'n
किसी के ख़याल ने रोका हुआ है मुझ को वरना
मुझे आवाज़ें तो इक दिन बहुत दीं ख़ुद-कुशी ने
ABhishek Parashar
जो इस को मज़हब से जोड़े ये उस की नादानी है
उर्दू  का  कोई  धर्म  नहीं  है  उर्दू  हिंदुस्तानी  है
Rehan Umar
लानत भेजो पहले ख़ुद को फिर हाकिम को
मज़हब मज़हब करने वाले अहमक़ लोगों
Lekhak Suyash
इबादत रक़्स का जौहर नहीं मंसब मोहब्बत है
यक़ीं क्यूँँकर दिलाऊँ मैं मिरा मज़हब मोहब्बत है
Karal 'Maahi'
उमूमन इश्क़ ही मज़हब रहे सब के अगर दिल में
कोई तन्हा कहाँ दिखता कभी भी यार महफ़िल में
Manohar Shimpi
छोड़ दीं सारी मनमानियाँ
अब तो मैं बस सही चुनता हूँ

शाम ढलते ही सो जाता हूँ
अब मैं सपने नहीं बुनता हूँ
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Yaduvanshi Abhishek
अम्न-ओ-अमाँ से हम ने गुज़ारी है ज़िंदगी
मज़हब के नाम पर कभी झगड़ा नहीं किया

उम्मीद उस बशर से करें क्या वफ़ा की हम
जिस ने किसी के साथ भी अच्छा नहीं किया
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SALIM RAZA REWA
ये नस्लें ख़त्म हो जाएँगी मज़हब की लड़ाई में
बचाने देश को तब फिर बताओ कौन आएगा
Neeraj Yadav 'Neer'
ख़ुशियों में झूमता हुआ संसार देखिए
फिर आ गया है ईद का त्यौहार देखिए

मज़हब के नाम पर न करो ऐसे इख़्तिलाफ़
इंसान बन के भी ज़रा इक बार देखिए
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Najmu Ansari Nazim
ग़रीबी और मज़हब बीच हैं अपने
मुझे अड़चन बहुत है तेरा होने में
Manish Yadav
उजली हसीन रात में जलसे निकाल कर
हम ने गुज़ारी तीरगी हर पल सँभाल कर

जीने की हम ने ख़्वाहिशें सारी ही छोड़ दीं
मरने का कर के फ़ैसला सिक्का उछाल कर
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Chetan Sharma 'Mizaj
बे-वफ़ा से इश्क़ करने का नतीजा ये हुआ
दीन और दुनिया हुए बर्बाद दोनों ही मेरे
A R Sahil "Aleeg"
जात–मज़हब ये सियासी दायरे हैं
हम नहीं आते तुम्हारे दायरे में
Pushpendra Panchal
मज़हब पर आ जाए बात तो बस्ती जलती है
रेप अगर हो तो सिर्फ़ मोमबत्ती जलती है
Jagveer Singh
छान डालीं सब ही धर्मों की किताबें
अब न वाक़िफ़ कौन मज़हब के रहे हम
Kabiir
मुबारक हो तुझे आशिक़ मिरी जाँ ग़ैर-मज़हब का
मुहब्बत तो मुहब्बत है तुझे भगवान ख़ुश रक्खे
SAAGAR SINGH RAJPUT
लड़कियों का ये दीन अब का नहीं
अब कोई बिगड़ा बकरा मारना है
Ammar 'yasir'
एक मज़लूम और इक ज़ालिम
दो ही मज़हब हैं सारी दुनिया में
Shakir Dehlvi
आलम-ए-इंसानियत क्या देखिए
ज़ात मज़हब का तमाशा देखिए

जाँ लुटा दी रौशनी के वास्ते
कैसा पागल है पतंगा देखिए
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Manish Pithaya
नई नस्लों को मज़हब में फँसा कर
क़लम से दूर करते जा रहे हैं

किसानी ख़ुद-कुशी कर लेगी इक दिन
किसानों पे वो दिन भी ला रहे हैं
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Kartik Bhalerao
मैं हटा दीन दुनिया से तो यूँँ हुआ
बंदगी भी गई ज़िन्दगी भी गई
Saniya Tasnim
जान भी वार दी जान लो
मुश्किलें कर दीं आसान लो
Amit Rajvanshi 'Guru'
बना कर हम ने दुनिया को जहन्नुम
ख़ुदा का काम आसाँ कर दिया है
Rajesh Reddy
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रास्ता जब इश्क़ का मौजूद है
फिर किसी की क्यूँँ इबादत कीजिए?

ख़ुद-कुशी करना बहुत आसान है
कुछ बड़ा करने की हिम्मत कीजिए
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Bhaskar Shukla
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यहीं तक इस शिकायत को न समझो
ख़ुदा तक जाएगा झगड़ा हमारा
Shariq Kaifi
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हम वो हैं जो ख़ुदा को भूल गए
तुम मेरी जान किस गुमान में हो
Jaun Elia
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मरने वालों को भी मिलते नहीं मरने वाले
मौत ले जा के ख़ुदा जाने कहाँ छोड़ती है
Krishna Bihari Noor
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ख़ुदा ने ये सिफ़त दुनिया की हर औरत को बख़्शी है
कि वो पागल भी हो जाए तो बेटे याद रहते हैं
Munawwar Rana
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ख़ुदा की शा'इरी होती है औरत
जिसे पैरों तले रौंदा गया है

तुम्हें दिल के चले जाने पे क्या ग़म
तुम्हारा कौन सा अपना गया है
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Ali Zaryoun
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क़फ़स उदास है यारों सबास कुछ तो कहो
कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले
Faiz Ahmad Faiz
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उम्र भर कौन निभाता है तअल्लुक़ इतना
ऐ मेरी जान के दुश्मन तुझे अल्लाह रक्खे
Ahmad Faraz
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इस आ
समाँ को मुझ सेे है क्या दुश्मनी "अली"?
भेजूँ अगर दुआ भी तो सर पर लगे मुझे
Read Full
Ali Rumi
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लंबा हिज्र गुज़ारा तब ये मिलने के पल चार मिले
जैसे एक बड़े हफ़्ते में छोटा सा इतवार मिले

माना थोड़ा मुश्किल है पर रोज़ दुआ में माँगा है
जो मुझ सेे भी ज़्यादा चाहे तुझ को ऐसा यार मिले
Read Full
Bhaskar Shukla
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उस की याद आई है साँसों ज़रा आहिस्ता चलो
धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है
Rahat Indori
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कितने हसीं हो माशा-अल्लाह
तुम पे मोहब्बत ख़ूब जचेगी
Zubair Ali Tabish
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कभी अल्लाह मियाँ पूछेंगे तब उन को बताएँगे
किसी को क्यूँ बताएँ हम इबादत क्यूँ नहीं करते
Farhat Ehsaas
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